कोई पास आया सवेरे सवेरे

कोई पास आया सवेरे सवेरे मुझे आज़माया सवेरे सवेरे मेरी दास्ताँ को ज़रा सा बदल कर मुझे ही सुनाया सवेरे सवेरे जो कहता था कल शब सँभलना सँभलना वही लड़खड़ाया सवेरे सवेरे

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बंदिनी

डा. कंचन का फोन आया था, “आज हमारे कारावास में कान्हा ने जन्म लिया है, सुमि।’’ उस समय मैं अपने घर में जन्माष्टमी की झाँकी सजा रही थी। डा. कंचन इस शहर

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नदी के दोनों पाट

नदी के दोनों पाट लहरते हैं आग की लपटों में दो दिवालिए सूदखोरों का सीना जैसे फुँक रहा हो शाम हुई कि रंग धूप तापने लगे अपनी यादों की और नींद में

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साधारण डाक

साधारण डाक से भेजी गईं वे पत्रिकाएँ जो कभी नहीं मिल पाती उसे पढ़ने के लिए कौन रख लेता होगा एक बार मेरा एक चेक डाल दिया गया था साधारण डाक में

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खिड़कियाँ

खिड़कियों को दरवाज़ों से ज़्यादा सुंदर होना चाहिए दरवाज़ों से मुझे एक भय रहता है कभी तुम निकलो और न लौट सको फिर कभी मेरी तरफ़ इसलिए, मैं इन खिड़कियों को सजाता

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कगार

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वह पूर्ण थी उसके मृत शरीर ने ओढ़ रखी है मुस्कान उपलब्धि की उसके पहने गए चोगे के सिलवटों में यूनानी होने का भ्रम झाँकता है उसके नंगे पैर यह कहते लग

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एलन गिन्सबर्ग के लिए

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बाकी चीज़ों के अलावा शुक्रिया, यह बताने के लिए कि कैसे पुराने वृक्षों की उदार मृत्यु लाल बारूद बन पूरे जंगल में बिछ जाती है । [ अनुवाद – सत्यम सोलंकी ]

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स्त्रियाँ घर लौटती हैं

स्त्रियाँ घर लौटती हैं पश्चिम के आकाश में उड़ती हुई आकुल वेग से काली चिड़ियों की पांत की तरह स्त्रियों का घर लौटना पुरुषों का घर लौटना नहीं है पुरुष लौटते हैं

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