रुश्दी के नाम ख़त

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Salman Rushdie

यह पहली दफ़ा नहीं है कि जब किसी ‘सलमान‘ ने मुझे मायूस किया है। सऊदी के युवराज मोहम्मद बिन सलमान ने दुनियाभर में, अपनी सल्तनत चलाने के लिए  ग़ैरक़ानूनी तरीकों को न सिर्फ़ बरकरार रखा बल्कि दुनिया को ये भी दिखाया कि असहमति की आवाजों को किस तरह दबाया जा सकता है; नये तरीक़ों से क़त्ल कैसे किए जा सकते हैं।

हाँ, मैं तुर्की के सऊदी दूतावास में जमाल ख़शोगी के क़त्ल की बात कर रहा हूँ। भारत में भी आप देखेंगे, मशहूर बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान ने किस तरह मनोरंजन को निचले स्तर तक पहुँचा दिया है। तीसरे सलमान, जिन्होंने मुझे मायूस किया है, वो हैं — सलमान रुश्दी।

रुश्दी के लेखन से मैं हमेशा मुतअस्सिर रहा। मिडनाइट्स चिल्ड्रन से लेकर द एनचैनट्रेस ऑफ़ फ़्लोरेंस  और उनके कई लेखों को पढ़ना, हमेशा दिलचस्प रहा। सबसे अहम बात यह है कि रुश्दी आज़ाद तक़रीर, ख़याल और अभिव्यक्ति की जीती-जागती मिसाल हैं। जब ईरान के मुल्ला उनके खून के प्यासे थे, तब भी रुश्दी डटे रहे, लिखते रहे और कभी-कभी छिपते भी रहे। 2022 के हमले के बाद उन्होंने नाइफ़: मीडिएशन्स आफ्टर एन अटेम्प्टेड मर्डर नाम की किताब लिखी। जिसमें उन्होंने लिखा — ‘ख़ुद को पीड़ित दिखलाने से इनकार करता हूँ, मैं बर्बरता का जवाब कला से दूंगा’।

फिलिस्तीनियों को जब इजरायल की ज़्यादती पर अपने जवाब का तरीका चुनना होता है, तब वहाँ रुश्दी उनके विकल्पों को सीमित कर देते हैं। कोई भी इंसान फ़साद के इस्तेमाल को या तो अपनी मंजूरी दे सकता है या फिर सिरे से नकार सकता है, लेकिन जब कोई औपनिवेशित लोगों की आज़ादी पर शर्तें लगाता है, और वह भी वामपंथी होकर, तब वह पुराने साम्राज्यवादी सोच का अनुसरण कर रहा होता है। सलमान रुश्दी भी इसी के कसूरवार हैं।

हाल ही में दिये एक साक्षात्कार में, रुश्दी ने कहा, “अगर अभी कोई फ़िलिस्तीनी क़ौम होता, तो उसे हमास चला रहा होता, जो तालिबान सरीखा राज्य होता और ईरान के मातहत होता।” मुझे यक़ीन है कि रुश्दी यह जानते होंगे कि हमास को इज़राइल ने फ़िलिस्तीनी मुक्ति संगठन और यासर अराफ़ात का मुकाबला करने के लिए बनाया था। इसरायली जनरल यित्झाक सेगेव ने रिकॉर्ड पर कहा कि — 1981 में, उन्हें फिलिस्तीनी इस्लामपरस्तों को पैसों से मदद करने के लिए बजट दिया गया था ताकि फिलिस्तीन की धर्मनिरपेक्ष ताकतों को कम किया जा सके। इसलिए, हमास का इस्तेमाल कर के फिलिस्तीनियों को उनकी आज़ादी के अधिकार से दूर करना ग़ैर-वाजिब और नाजायज़ है।

रुश्दी को यह भी याद रखना चाहिए कि 1967 में छह दिन की जंग के बाद धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद  ख़त्म हो गया था। पश्चिम और इजरायल ने इसे इसलिए कुचल दिया क्योंकि वे जम्हूरियत के बजाय तानाशाही को पसंद करते थे। इससे पहले, गमाल अब्दुल नासिर जैसे नेता ‘राष्ट्रीय एकता’ और ‘समाजवाद’ के नाम पर फिलिस्तीन की आज़ादी की बात करते थे। नासिर की मौत के बाद, होस्नी मुबारक जैसे तानाशाहों ने धर्मनिरपेक्ष अरब एकता और फिलिस्तीन की आज़ादी पर चर्चा की कोई संभावना नहीं छोड़ी। इस खाली जगह को इस्लाम परस्तों ने भरा, जिन्होंने जनता को ये समझाया कि उनकी इस हार का कारण — उनका धर्म के रास्ते को छोड़ना है।

राजनीतिक इतिहासकार मोहम्मद मोहम्मदौ ने इसको बेहतर तरीक़े से समझाया है। वो लिखते हैं — “ग़ौरतलब हो, 1970 का दशक, दहशतगर्दों का दशक था। उस वक़्त दहशतगर्दी ने जम’आत  में अफ़रा-तफ़री फैलाने के लिए बड़ी कोशिशें की मसलन जम’आत के दूसरे हिस्सों को काटना, क़ौम और उसके अलामत की तरफ़ नफ़रती नज़रिया रखना, और फ़साद की आड़ में दूसरे जन्म को ले कर झूठे ख़्वाब दिखाना।” इन सब की वजह से ही अल-कायदा बना, जिसे पश्चिम, ख़ास तौर से संयुक्त राज्य अमेरिका ने अफगानिस्तान में खूब मदद पहुँचायी। और जब यह शैतान क़ाबू से बाहर हो गया, तो पश्चिम ने उसका साथ छोड़कर उसे रोकने की कोशिश की। बक़ौल एडवर्ड सईद, इस सब का असर यह हुआ कि पश्चिम ने इस्लाम को ‘ग़ैर-मुल्क़ की तहज़ीब की माज़रत का चेहरा’ बना दिया।

रुश्दी का जो फासीवाद को लेकर डर है, उसकी वजह नेतन्याहू और उनके दक्षिणपंथी दोस्त होने चाहिए, न कि फिलिस्तीनी। नेतन्याहू की फासीवादी सोच का इतिहास पुराना है। 1986 में, एडवर्ड सईद और नेतन्याहू एक टेलीविजन शो की डिबेट में शामिल होने वाले थे। उस वक़्त नेतन्याहू संयुक्त राष्ट्र में इजरायल के राजदूत भी थे। नेतन्याहू ने सईद के साथ एक ही कमरे में रहने से इनकार कर दिया। उन्होंने एक अलग इमारत में रहने की माँग की ताकि वो उनकी मौजूदगी से ‘ख़राब’ न हो जाएँ।

यूरोप और उत्तरी अमेरिका के इलाक़ों में एहतिजाज करने वाले छात्र हमास के तरफ़दार नहीं हैं। वे रुश्दी की ‘स-शर्त’ आज़ादी के ख़िलाफ़ ‘बिला-शर्त’ आज़ादी की हिमायत में केफ़ियाह पहनते हैं और फिलिस्तीनी झंडा लहराते हुए दिखते हैं। रुश्दी और एहतिजाजी छात्रों के बीच फ़र्क़ अख़लाक़ के नज़रिए का है। जहाँ छात्र, इजरायली सुरक्षा के नाम पर 13,500 से ज़्यादा बच्चों की लाश देख रहे हैं वहीं रुश्दी इसे इस्लामी फासीवाद करार देते हुए वाज़िब ठहराते हैं।

मेरा ख़याल है कि मैंने इसपर काफ़ी बात कर ली है। मुझे उम्मीद है कि एक दिन कोई फिलिस्तीनी भी सलमान की तरह उठेगा और कलम उठाएगा। वह अपने परिवार, पड़ोसियों और दोस्तों की वफ़ात के बारे में लिखेगा। सलमान रुश्दी को अपने इस दावे को सही होता हुआ देखने के लिए अभी कुछ और मौसम देखने होंगे। फ़िलवक्त, मैं उनकी सलामती और खुशहाली की दुआ करता हूँ।

(अनुवाद: कुमार राहुल)

Shubham Sharma
शुभम् शर्मा

शुभम् शर्मा मौजूदा समय के महत्वपूर्ण अकादमिकों में एक प्रमुख नाम हैं। वे वामपंथी विचारधारा की प्रखर आवाज़ों में से एक हैं। उन्होंने अपनी एमफिल कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से की है और इन दिनों कनेक्टिकट विश्वविद्यालय, अमेरिका से अपनी पीएचडी कर रहे हैं। आपसे com.shubham10@gmail.com पे बात की जा सकती है।

शुभम् शर्मा मौजूदा समय के महत्वपूर्ण अकादमिकों में एक प्रमुख नाम हैं। वे वामपंथी विचारधारा की प्रखर आवाज़ों में से एक हैं। उन्होंने अपनी एमफिल कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से की है और इन दिनों कनेक्टिकट विश्वविद्यालय, अमेरिका से अपनी पीएचडी कर रहे हैं। आपसे com.shubham10@gmail.com पे बात की जा सकती है।

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