यूँ न रह रह कर हमें तरसाइए

यूँ न रह रह कर हमें तरसाइए आइए आ जाइए आ जाइए फिर वही दानिस्ता ठोकर खाइए फिर मिरी आग़ोश में गिर जाइए मेरी दुनिया मुंतज़िर है आप की अपनी दुनिया छोड़

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थोड़ा-सा

अगर बच सका तो वही बचेगा हम सबमें थोड़ा-सा आदमी– जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता, अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर, जो रास्ते पर पड़े घायल को

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नामवर सिंह के पत्र मुक्तिबोध के नाम

1. लोलार्क कुंड, भदैनी वाराणसी-1 1 मई 1957 प्रिय भाई मुक्तिबोध जी, आज रात विष्णु ने आपका पत्र दिया। देर रात तक उसे पढ़ता रहा अर्थात् लिखी हुई पंक्तियों के बीच में

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एकालाप और संलाप

कुछ लोग दुनिया से बहस करते हैं तो कुछ सिर्फ अपने से, किन्तु कुछ थोड़े से लोग ऐसे भी होते हैं जो दुनिया से बहस करने की प्रक्रिया में अपने-आप से भी

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आफ्टर ब्रेकअप

साथ रहने का वादा मर्तबान में पड़ा अचार था सड़ गया फेंक दिया और सुनो तुम्हारी सब्जी में नमक हमेशा ज्यादा होता था और मैं नहीं भूला मेरी व्हाईट शर्ट पर तुम्हारे

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सो रहेंगे कि जागते रहेंगे

सो रहेंगे कि जागते रहेंगे हम तिरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कहीं और ढूँढता रहेगा हम कहीं और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहे हैं

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कुछ आवाज़ें मलहम होती हैं

तुम्हारी आवाज़ की उँगली पकड़े मैं करती हूँ यात्रा अधैर्य से धैर्य की आक्रोश से प्रेम की उद्वेग से शांति की विषम से सम की तुम्हारी आवाज़ के आरोह-अवरोह में समा जाते

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