मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो
नुक्ता-चीं है ग़म-ए-दिल उस को सुनाए न बने क्या बने बात जहाँ बात बनाए न बने मैं बुलाता तो हूँ उस को मगर ऐ जज़्बा-ए-दिल उस पे बन जाए कुछ ऐसी कि
Moreयूँ न रह रह कर हमें तरसाइए आइए आ जाइए आ जाइए फिर वही दानिस्ता ठोकर खाइए फिर मिरी आग़ोश में गिर जाइए मेरी दुनिया मुंतज़िर है आप की अपनी दुनिया छोड़
Moreबेसन की सौंधी रोटी पर खट्टी चटनी जैसी माँ याद आती है! चौका बासन चिमटा फुकनी जैसी माँ बाँस की खर्री खाट के ऊपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी
Moreमुझे उदास कर गए हो ख़ुश रहो मिरे मिज़ाज पर गए हो ख़ुश रहो मिरे लिए न रुक सके तो क्या हुआ जहाँ कहीं ठहर गए हो ख़ुश रहो ख़ुशी हुई है
More1. लोलार्क कुंड, भदैनी वाराणसी-1 1 मई 1957 प्रिय भाई मुक्तिबोध जी, आज रात विष्णु ने आपका पत्र दिया। देर रात तक उसे पढ़ता रहा अर्थात् लिखी हुई पंक्तियों के बीच में
Moreकुछ लोग दुनिया से बहस करते हैं तो कुछ सिर्फ अपने से, किन्तु कुछ थोड़े से लोग ऐसे भी होते हैं जो दुनिया से बहस करने की प्रक्रिया में अपने-आप से भी
Moreसाथ रहने का वादा मर्तबान में पड़ा अचार था सड़ गया फेंक दिया और सुनो तुम्हारी सब्जी में नमक हमेशा ज्यादा होता था और मैं नहीं भूला मेरी व्हाईट शर्ट पर तुम्हारे
Moreसो रहेंगे कि जागते रहेंगे हम तिरे ख़्वाब देखते रहेंगे तू कहीं और ढूँढता रहेगा हम कहीं और ही खिले रहेंगे राहगीरों ने राह बदलनी है पेड़ अपनी जगह खड़े रहे हैं
Moreतुम्हारी आवाज़ की उँगली पकड़े मैं करती हूँ यात्रा अधैर्य से धैर्य की आक्रोश से प्रेम की उद्वेग से शांति की विषम से सम की तुम्हारी आवाज़ के आरोह-अवरोह में समा जाते
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