दुःख से कैसा छल

मूरख है कालीघाट का पंडित सोचता है मंत्रोचार से और लाल पुष्पों से ढक लेगा पाप नहीं फलेगा कुल गोत्र के बहाने कृशकाय देह का दुःख मूरख है ममता बंदोपाध्याय का रसोइया

More

धर्म बच जाए शायद

एक व्यक्ति के क़त्ल के बाद माँ रोती है पूरा अस्तित्व रोता है साथ में आदम और हव्वा रोते हैं अपने नस्लों के हश्र पर इन सबमें शामिल हैं ईश्वर के आंसू

More

तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती

यदि वेदों में लिखा होता ब्रह्म के पैर से हुए हैं पैदा। उन्हें उपनयन का अधिकार नहीं। तब, तुम्हारी निष्ठा क्या होती? यदि धर्मसूत्रों में लिखा होता तुम ब्राह्मणों, ठाकुरों और वैश्यों

More

मेरे पुरखे

तुमने कहा— ब्रह्मा के पाँव से जन्मे शूद्र और सिर से ब्राह्मण उन्होंने पलट कर नहीं पूछा— ब्रह्मा कहाँ से जन्मा? तुमने कहा— सेवा ही धर्म है शूद्र का उन्होंने नहीं पूछा—

More

शूद्र आदमी

तीन आदमियों के आगे भोजन की थाली है चौथे के आगे थाली ख़ाली है तीन आदमियों के बदन पर रेशमी परिधान है चौथे का बदन उघड़ा है तीन आदमियों के बिस्तर बंगलों

More

जवान होते बेटों 

जवान होते बेटों ! इतना झुकना इतना कि समतल भी ख़ुद को तुमसे ऊँचा समझे कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े

More

डिबेट

मुझे डर लगता है कि किसी दिन वे मुझे डेथ सर्टिफिकेट थमा देंगें। आप जो हैं वह आप नहीं हैं, कहकर वो मुझे अख़बारों में मुखाग्नि न दे दें। कहीं किसी न्यूज़

More

अजायबघर

पृथ्वी कितनी छोटी थी जब हमारे पास मिलने की आकांक्षा थी। आकांक्षाएं  सिमटती रहीं और एक दिन बहुत दूर हो गए हमसे हमारे ही शहर। एक तरह का अजनबीपन बस गया है

More

आख़िरी कविता

जा रहा हूँ मैं बुद्ध इस दलहीन बौद्ध मठ से जा रहा हूँ आनंद या दुःख में पता नहीं चला जा रहा हूँ मैं चला जा रहा हूँ मुंबई, दिल्ली और कलकत्ते

More

मैं कृतज्ञ हूँ

नहीं हूँ किसी का भी प्रिय कवि मैं ज़रा देर से ही सही मुझे यह ज्ञात हुआ आज मैं कृतज्ञ हूँ जाने-अनजाने हर किसी का और यह हर किसी का व्यूह मुझे

More
1 3 4 5 6 7 35