हार की जीत

नहीं, मुझे अपनी परवाह नहीं परवाह नहीं हारें कि जीतें हारते तो रहे ही हैं शुरू से लेकिन हार कर भी माथा उठ रहा और आत्मा रही जयी यवांकुर-सी हर बार सो,

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खोया हरा सुग्गा

जैसे हाथ से दमड़ी खो जाती है जैसे खेलते वक्त निशाना मारने पर कभी-कभी टन्ना खो जाता है जैसे अंगुलियों से रेंड़ी छूट जाती है जैसे देखते ही देखते हवा में उड़

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ज़िस्म की भूख

ज़िस्म की भूख कहें या हवस का ज्वार कहें। सतही जज्बे को मुनासिब नहीं है प्यार कहें॥ बारहा फ़र्द की अज़मत ने जिसे मोड़ दिया। हम भला कैसे उसे वक़्त की रफ़्तार

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आदर्श चरित्र

खट्टर काका ने मेरे हाथ में पुस्तक देखकर पूछा – आज बड़ी मोटी पुस्तक लेकर चले हो, जी! मैंने कहा – आदर्श चरितावली है। खट्टर काका मुस्कुरा उठे। बोले – आजकल कोई

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तीन सौ रामायण : पाँच उदाहरण और अनुवाद पर तीन विचार

कितनी प्रकार की रामायण? तीन सौ? तीन हजार? कुछ रामायणों के अन्त में कभी-कभी एक प्रश्न पूछा जाता है कि यहाँ कितनी प्रकार की रामायण सामने आई हैं? और यहाँ कुछ कथाएँ

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ग़ालिब के परसाई

तमाम दूबों, चौबों, तिवारियों, वर्माओं, श्रीवास्तवों, मिश्रों को चुनौती है – बता दे कोई , अगर ग़ालिब के पूरे दीवान में कहीं किसी का ज़िक्र हो। कबीरदास ने अलबत्ता हमारे पड़ोसी पाण्डेयजी

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‘तीसरी कसम’ के सेट पर तीन दिन

पूरे चालीस घण्टे की लम्बी और ऊबभरी यात्रा का अन्त डेढ़ बजे दिन में दादर स्टेशन पर हुआ। प्लेटफार्म पर पैर रखते ही सूचना मिली के ‘तीसरी कसम’ की शूटिंग कमाल स्टूडियो

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कविता में अभिव्यक्ति और सम्प्रेषण

यह निबन्ध ‘अदबी दुनिया’ लाहौर के 1939 के वार्षिक अंक में प्रकाशित करते हुए इस प्रतिष्ठित पत्रिका के सम्पादक और उर्दू के बुजर्ग साहित्यकार मौलाना सलाहुद्दीन अहमद ने लिखा थाः “प्रोफेसर फैज़

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कविता एक पेशा है

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नेरुदा के लिए कविता कोई शौक की चीज नहीं थी कि गाहे-बगाहे, स्वांतः सुखाय, जब मन में आया लिख लिया और जब इच्छा नहीं हुई, महीनों उसकी ओर झाँका भी नहीं। कविता

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मेरे काम की नहीं

बहुत उम्मीद थी कि लौटते ही ढेर सारे बंद लिफाफे गेट पर लगे बक्से में बेतरतीब पड़े मिलेंगे। स्वीच ऑफ बताता फोन अपनी जद में पहुंचते ही मिसकॉल, अनरीड मेसेज की सूचनाएं

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