हार की जीत

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नहीं, मुझे अपनी परवाह नहीं
परवाह नहीं हारें कि जीतें
हारते तो रहे ही हैं शुरू से
लेकिन हार कर भी माथा उठ रहा
और आत्मा रही जयी यवांकुर-सी हर बार

सो, मुझे हार-जीत की परवाह नहीं
लेकिन आज ऐसा क्यों लग रहा है जैसे मैं खड़ा हूँ और
मेरा माथा झुक रहा है
लगता है आत्मा रिस रही है तन से
रक्त फट रहा है
और मेरे कंधे लाश के बोझ से झुक रहे हैं

नहीं, यह बात किसी को मत बताना खड्ग सिंह
नहीं तो लोग ग़रीबों पर विश्वास करना छोड़ देंगे।

अरुण कमल

अरुण कमल (जन्म-15 फरवरी, 1954) आधुनिक हिन्दी साहित्य में समकालीन दौर के प्रगतिशील विचारधारा संपन्न, अकाव्यात्मक शैली के ख्यात कवि हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि ने कविता के अतिरिक्त आलोचना भी लिखी है, अनुवाद कार्य भी किये हैं तथा लंबे समय तक वाम विचारधारा को फ़ैलाने वाली साहित्यिक पत्रिका आलोचना का संपादन भी किया है।

अरुण कमल (जन्म-15 फरवरी, 1954) आधुनिक हिन्दी साहित्य में समकालीन दौर के प्रगतिशील विचारधारा संपन्न, अकाव्यात्मक शैली के ख्यात कवि हैं। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि ने कविता के अतिरिक्त आलोचना भी लिखी है, अनुवाद कार्य भी किये हैं तथा लंबे समय तक वाम विचारधारा को फ़ैलाने वाली साहित्यिक पत्रिका आलोचना का संपादन भी किया है।

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