क्या भूलूँ क्या याद करूँ

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मेरी विगत स्मृतियों, मेरे पूर्व इतिहास, मेरे वर्तमान के श्रम-संघर्ष को जैसा उसने जाना था, जैसी मेरी स्थिति की निकट भविष्य में, कम से कम अपने जीवन-काल में उसने कल्पना की थी, उससे उसने मेरा नाम Suffering रख दिया था। शायद कोई नहीं जानता था कि वह मुझे इस नाम से पुकारती है – जब हम अकेले होते वह मुझेउसी नाम से संबोधित करती और मैं उसे Joy कहता। मृत्यु शय्या पर जब उसकी चेतना लुप्त हो रही थी, वह मुझे सबके सामने भी उसी नाम से पुकारती गई और शायद ही कोई समझा हो कि वह किसे पुकार रही है और क्या कहना चाहती है।

मुझे Suffering नाम देने में शायद श्यामा ने मेरे स्वभाव, मेरी प्रकृति, मेरे जीवन, मेरे व्यक्तित्व में बीज की तरह छिपे मेरे कवि को भी पहचाना था। शायद उसने समझ लिया था कि कवि तो साकार वेदना (Suffering) ही है। मैं जिस वेदना से गुज़रा हूँ या गुज़र रहा हूँ उससे कविता के बीज के लिए भूमि ही तो अपने अंदर तैयार कर रहा हूँ। वेदना के बिना मनुष्य का अहं नहीं टूटता, और अहं के टूटे बिना एक मनुष्य के हृदय से दूसरे मनुष्य के हृदय तक पहुँच नहीं होती, सेतु नहीं बनता। विचारों का सेतु एक दिमाग़ से दूसरे दिमाग़ तक बिना अहं के टूटे भी बन सकता है, पर भावनाओं का, कभी नहीं, और कविता भावनाओं के सेतु पर चढ़कर ही एक हृदय से दूसरे हृदय तक जाती है। हृदय-हृदय के बीच भावनाओं के सेतु का निर्माण किए बगैर जो शब्दों का कारवाँ रवाँ कर देते हैं उसका परिणाम इसके सिवा कुछ नहीं हो सकता कि उनका कारवाँ काग़जों के मरुस्थल में खो जाए या निरर्थक ध्वनि बनकर शून्य में विलीन हो जाए। यह भावनाओं का सेतु बनाने से अधिक बन जाने पर निर्भर है। इसी से कहा जाता है कवि जन्म लेते है, बनाए नहीं जाते। जीवन की न जाने कैसी-कैसी स्थितियाँ-परिस्थितियाँ अपने आप

आकर न जाने किसे तोड़, औरों से जोड़ जाती है। मैं तो कहता हूँ कि इतना होने से ही आदमी कवि बन जाता है। जीवन में बहुत-से कवि हैं जो शब्दों में कविता नहीं करते। शब्द कविता का, वास्तव में, बहुत-से माध्यमों में से केवल एक माध्यम है। मैंने कहीं पढ़ा था- अंग्रेज़ी में – हिंदी अनुवाद दे रहा हूँ, ‘कविता लिखने का उतना विषय नहीं, जितना जीने का, और कविता जीना जीने का सबसे दुःसाध्य रूप है।’ यह बिलकुल यही है जो कबीर कहते हैं,

                     सीस काटि भुइँ पै धरै, तापन धारै पाँव,

                    दास कबीरा यों कहै ऐसा होउ तौ आव!

     इसका अर्थ सतही नहीं। इस पर ग़ौर करना होगा। शीश काटना तो शायद संभव भी हो जाए, पर उसको उठाकर भूमि पर धरना और फिर उस पर पाँव रखना तो तभी संभव हो सकता है जब मरने के बाद भी कोई जीता रहे – जीने की चेतना अपने हाथों में बचाए रहे। अहं के कटने के बाद जो चेतना शीश को उठाती है, उस पर पाँव धरती है, उसी का नाम कवि है। और आप मेरी बात मानें तो कवि को हर कविता लिखते समय यह दुर्धर्ष चमत्कार करना होता है। या यों कहें कि जब भी सच्चे अर्थों में कविता

बनती है कवि इसी प्रक्रिया से गुज़रा होता है। एक आइरिश कहावत है It is death to be a poet. इसे मैं अर्द्ध सत्य कहूँगा, पूर्ण सत्य यह है It is living after death to be a poet. कवि मरना नहीं है – कवि मरकर सचेत रहना है।

स्वस्थ पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध स्वाभाविक, आवश्यक और अनिवार्य है। पर श्यामा के शरीर की जैसी स्थिति थी उसमें शरीर को दीवार मानकर प्राण-प्राणों के मिलन पर ही प्रायः संतोष करना था। ‘कवि की वासना’ में जो मैंने लिखा था,

‘वासना जब तीव्रतम थी/बन गया था संयमी मैं,/है रही मेरी क्षुधा ही/सर्वदा आहार मेरा।/या ‘हलाहल’ में कि/’वासना है मेरी विकराल,/अधिक, पर, अपने पर विश्वास’

वह मेरी उन दिनों की तीव्र, तीक्ष्ण और तनावपूर्ण अनुभूति ही थी जो शब्दों में मुखरित हुई थी। हर संयम का कहीं न कहीं विस्फोट होता है और उसके लिए न मैं लज्जित हूँ, न अपने को दोषी ठहराता हूँ। यह मैं बड़ी सच्चाई के साथ कहता हूँ कि उसका अधिकतम विस्फोट निश्चय ही मेरे काव्य के रूप में हुआ।

बी.ए. में मेरे प्रथम श्रेणी के बाद मेरे कुछ संबंधियों ने मुझे सलाह दी कि मैं आई.सी.एस. में बैठने की तैयारी करूँ। बैठता तो शायद आ ही जाता और आज सरकारी नौकरी कर विद्याशंकर की तरह रिटायर हो जाता। हो जाता तो इसमें बुरा ही क्या होता। कुछ कविताएँ लिखकर रिटायर हो रहा हूँ तो कौन बड़ी लाट खड़ी कर दी है। घर में राष्ट्रीयता का ऐसा वातावरण था और आने वाले नमक सत्याग्रह आंदोलन की आहें इतनी तेज़ होती जा रही थीं कि मेरे पिता जी ने इसके लिए राय न दी। शायद यही एक बात मैंने उनकी मानी। वे चाहते थे कि मैं एम.ए. करके किसी कालेज या युनिवर्सिटी में अध्यापक बन जाऊँ। मैंने अंग्रेज़ी में एम.ए. ले लिया। पर बी.ए. करते समय मैंने जिस तन्मयता से अध्ययन किया था वह मेरे लिए अब दूर्लभ हो गई। सबसे बड़ी चिंता श्यामा की बीमारी थी। मैं अब अपने पढ़ने के लिए कमाऊँ कि श्यामा के इलाज के लिए, गो मैं जो कुछ कमा सकता था वह इलाज के लिए बिलकुल नाकाफी होता। इस बीच एक और अपमान-जनक घटना घटी।

मकान बनवाने के सिलसिले में ईटवाले का क़रीब दो हजार का कर्ज़़ हो गया था। उसने नालिश कर दी। ईंट वाले की डिग्री हो गई कि मकान नीलाम करा के रुपया वसूल कर लिया जाए और एक दिन कुर्कअमीन नगड़िया वाले को लेकर घर पर आ गए। उसने डिम-डिम-डिम-डिम करके यह पुकार लगाई :

‘ख़लक ख़ुदा का, मुलुक बादशाह का

हुकुम बड़े साहब का

बाबू प्रताप नारायण वल्द भोलानाथ का मकान नीलाम होता है

जिसको बोली बोलना हो आगे आए ….

सरे बाज़ार हमारी गरीबी को नंगा करने वाले उन शब्दों से हमने बड़े ही अपमान का अनुभव किया। घर में हर एक की यही इच्छा होती थी कि धरती फट जाए और एक-एक उसमें समा जाए! यह तो अच्छा हुआ कि नया मुहल्ला था, पुराना मुहल्ला होता तो हम इस पर घर के अंदर जाकर आत्महत्या कर लेते। दस हज़ार की लागत का मकान पिता जी को दो हज़ार में रेहन रख देना पड़ा। अब ये दो हज़ार रुपये कहाँ से आएँ।

मेरे छोटे भाई शालिग्राम ने बी.ए. का इम्तहान दिया था, रेज़ल्ट आने से पहले हो उन्हें इलाहाबाद बैंक में नौकरी मिल गई, और घर की स्थिति देखते हुए उन्होंने आगे पढ़ने की बात न सोची। कायस्थों के यहाँ लड़का बे-भुनाई हुंडी कहा जाता है। बाँदा के वकील बाबू गया प्रसाद की ओर से शालिग्राम के रिश्ते का प्रस्ताव आया। लड़की सुंदर, पढ़ी-लिखी, सुशील थी, साथ ही अच्छा दहेज मिलने की आशा थी। पिता जी ने शादी मंजूर कर ली। शालिग्राम के तिलक में जो रुपए नक़द मिले उसमें से दो हज़ार देकर

मकान छुड़ा लिया गया, पर उनकी शादी पर कुछ रुपया खर्च होना था, खासकर चढ़ाव के लिए गहनों पर। श्यामा ने फिर अपनी उदारता, त्याग और बड़प्पन का परिचय दिया। उसने अपने सब ज़ेवर शालिग्राम की वधू के लिए दे दिए। परिवार की लाज बचने का दूसरा तरीक़ा न था।

मेरी एम.ए. प्रीवियस की परीक्षा से पहले ही गांधी जी की डाँडी यात्रा आरंभ हो गई थी और उनके प्रति पग से देश में राष्ट्रीय जागरण और जोश ज़ोर मारने लगा। बेमन से मैंने परीक्षा दे दी, पास भी हो गया, पर जुलाई में जब युनिवर्सिटी खुली तो मैंने पढा़ई छोड़ दी। कुछ पारिवारिक चिंताओं और कुछ राजनैतिक हलचलों के करण मेरा मन पढ़ने की तरफ़ से उचट गया था। मैं आंदोलन में सक्रिय भाग लेने की स्थिति में न था, जुलूसों में नारे लगाता, सभाओं में शामिल होता। घर में चख चलाता, जमुना पार गाँठों में जाकर व्याख्यान देता। कुछ रचनात्मक कार्य करने को भी मैंने सोचा- हम खद्दर का प्रचार करेंगे! महेश, प्रकाश और मैंने एक टीम बनाई। खादी भंडार से हम लोग एक गट्ठर खादी का लेते, महेश हममें सबसे मोटे-मजबूत थे, वे गट्ठर उठाते, मैं गज़ से नापता, प्रकाश हिसाब रखते, और इस तरह हम दिन भर गली-गली घूमते। हमें एक दिन बड़ी प्रसन्नता हुई जब पंडित जवाहरलाल नेहरू का ध्यान हमारी ‘खद्दर प्रचारक टीम’ की ओर आकर्षित हुआ और उन्होंने भरी सभा में हमारी प्रशंसा की। उन्हीं दिनों मैंने जुलूसों में गाने के लिए कई राष्ट्रीय गीत लिखे जिनमें ‘सर जाए तो जाए पर हिंद आज़ादी पाए’ वाला गाना बहुत प्रसिद्ध हुआ और एक बार इसे महात्मा गांधी की उपस्थिति में श्याम कुमारी नेहरू ने हज़ारों लोगों को गवाया। तब शायद किसी ने जाना भी नहीं था कि यह गीत किसका लिखा था और न मुझे ही इच्छा थी कि कोई जाने। गीत से जोश फैल रहा था और देश के लिए मर मिटने की आन पर शान चढ़ रही थी – व्यक्ति को श्रेय देने का क्या मतलब? पर जैसे-जैसे नेता लोग गिरफ्तार होते गए आंदोलन ठंडा पड़ने लगा, फिर समझौते शुरू हुए, और असफल होने पर दमन शुरू हुआ। समझौतों के साथ ही जनता का संपर्क आंदोलन से कम होने लगा, छूट गया । समूह बिखरता है तो व्यक्ति अपने को अकेला पाता है – अब न सभा है, न जुलूस है, अपनी-अपनी फ़िक्र करो। मैंने भी कुछ ऐसा ही अकेलापन अनुभव किया। क्या करूँ? ‘किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है। मधुशाला।‘

काम की तलाश में एक दिन ‘चाँद’ कार्यालय जा पहुँचा। संपादन विभाग में काम मिला, पर एक महीने बाद वहाँ से अपमानित करके निकाल दिया गया | उस अप्रिय अनुभव की बात कहीं लिख चुका हूँ। उसी साल मुट्ठीगंज के मास्टर भगवान सहाय ने माडर्न स्कूल से इस्तीफ़ा देकर एक राष्ट्रीय स्कूल इलाहाबाद हाई स्कूल के नाम से खोल दिया था। उसमें मुझे अध्यापक की जगह मिल गई। काग़ज पर पैंसठ रुपए लिखे जाते थे, तनख्वाह पचीस रुपए दी जाती थी। राष्ट्रीय स्कूल के लिए त्याग की हमसे प्रत्याशा की जाती थी, जिससे स्कूल के लिए और ज़रूरी सामान वग़ैरह खरीदा जा सके। ऐसा त्याग प्रायः सभी अध्यापक करते थे, और खुशी से, कि हम राष्ट्र के उत्थान में योग दे रहे है। मान्यता स्कूल को मिली नहीं थी, इसलिए लड़कों को पंजाब से प्राइवेटली इम्तहान देने को भेजा गया। फ़ार्म के भरने में कुछ गड़बड़ी हुई और स्कूल का कोई लड़का इम्तहान में न बैठने दिया गया दूसरे। वर्ष नवें-दसवें क्लास टूट गए। एक बंगाली सहयोगी के साथ मैं इन्हीं दर्जों को पढाता था, हम दोनों को छुट्टी दे दी गई। इस वर्ष भर के अनुभव का शायद सबसे बड़ा लाभ यह था कि बंगाली महाशय ने मुझे पूरी ‘अग्निवीणा’ पढ़कर सुनाई और समझाई। वे नज़रुल के बड़े प्रेमी थे।

बड़ी कोशिश के बाद मुझे प्रयाग महिला विद्यापीठ में 30 रु. प्रतिमास पर नौकरी मिल गई, जिसकी स्थापना हाल ही हुई थी। महादेवी जी बाद को वहाँ प्रिंसिपल बनकर आई।

इसी समय अपने चाचा लोगों से मेरा पारिवारिक संबंध टूट गया। शालिग्राम का गौना हुआ। बहुभोज की दावत थी, केवल परिवार के सदस्यों और निकट संबंधियों की। इसके पूर्व मैंने एक ऐसा काम कर दिया था जो मेरे रिश्तेदारों के रूढ़िगत संस्कारों पर आघात करनेवाला था। मोहतशिम गंज में एक कायस्थ परिवार था। पति की मृत्यु हो गई – विधवा कई बच्चों को लेकर कहाँ जाए। बाहर से आए एक सिख सरदार ने उसे बैठा लिया। थोड़े दिनों बाद सरदार की भी मृत्यु हो गई। परिवार समाज बहिष्कृत हो गया, यानी उससे रोटी-बेटी का व्यवहार बंद। उस परिवार में किसी सयानी लड़की का विवाह एक अच्छे कायस्थ परिवार में लगा। उन लोगों ने शर्त रक्खी कि अगर दो-चार अच्छे कायस्थ घरों के लोग उनके यहाँ रोटी खा लें तो वे शादी मंजूर कर लेंगे। इस बहिष्कृत परिवार के लोग जितने भले थे उतने मैंने जीवन में कम देखे थे- सब की सेवा करने को तैयार और सबके सामने विनम्र । मोहल्ले-टोले में किसी के यहाँ शादी-काम-काज होता तो वे हर तरह का काम करते, पर खाने के समय ग़ायब हो जाते – वे जानते थे कि लोग उन्हें अपने साथ बिठलाकर न खिलाएँगे। अपने उदार विचारों के कारण मुझे इस परिवार से बड़ी सहानुभूति थी। जग्गू चाचा के भाई रामू चाचा, उनके लड़के मुंशी कन्हैयालाल और दो-चार लोग, जिनमें मैं भी था, उस परिवार में रोटी खाने को तैयार हुए। उन लोगों ने बड़ी आवभगत से हमें खाना खिलाया। उनकी आँखों में आँसू् थे, जैसे हमने उनके साथ जो उपकार किया था उसे वे व्यक्त न कर सकते हों। हम खुश थे कि चलो हमने एक परिवार का  उद्धार किया। बिरादरी के दकियानूस इसपर जले-भुने बैठे थे।

इनमें हमारे मोहन चाचा भी थे। हमारे यहाँ बहुभोज का भोजन तैयार – पन्द्रह-बीस निकटतम संबंधियों के लिए। आठ बजे रात का समय दिया गया था। आठ बज गए, नौ बज गए, दस बज गए, ग्यारह बजने के निकट पहुँचे, कोई न आया। हम चकित-चिंतित थे। तब किसी कहारिन ने बताया कि बाबू मोहनलाल हमारे यहाँ खाना खाने इसलिए न आए थे कि मैंने बहिष्कृत परिवार में भोजन कर लिया था। मेरे हरिजनों के साथ खाने-पीने की बात वे जानते ही थे, और उन्होंने हमारे सब निकट संबंधियों को आगाह कर दिया था कि जो हमारे यहाँ भोजन करेगा वह जाति-च्युत कर दिया जाएगा। इसी डर से कोई हमारे यहाँ नहीं आया था। मुझे बड़ा क्रोध आया। निमंत्रण न स्वीकार करना मैं समझ सकता था। न आना था तो सूचित करने की भलमंसी तो दिखानी थी, पर वे तो हमें अपमानित करना चाहते थे। पिता जी बहुत ही दुखी हुए – बिरादरी से कट जाने के भय से वे काँप उठे, अभी उनकी एक लड़की ब्याहने को थी। मैंने पिता जी को समझाया कि हमें बिरादरी ने छोड़ दिया है तो अब हम मानव परिवार के सदस्य है। मुझे हिंदू समाज का सारा ढाँचा इतना रुग्ण, सड़ा, गला, दुर्गंधित इससे पहले कभी नहीं लगा।

1923-24 में कविता के नाम से जो मैने लिखा था वह मैने नष्ट कर दिया था। उसके लिए मुझे पश्चाताप नहीं, उसमें वास्तविकता होगी, अभिव्यक्ति होगी, पर प्रेषण उद्बोधन शायद ही रहा होगा, जिसके बिना कविता कविता नहीं होती। 1929 से मैं फिर कुछ लिखने लगा था, ’30 से विशेषकर, जब मैंने युनिवर्सिटी छोड़ दी थी। 1930 की युनिवर्सिटी प्रतियोगिता में मेरी कहानी को प्रथम पुरस्कार मिला था, ’31 में मैं युनिवर्सिटी का विद्यार्थी न था, पर प्रतियोगिता में मैंने कहानी भेज दी थी। वह कहानी ‘हृदय की आँखें’ इतनी अच्छी समझी गई कि प्रतियोगिता के अंत में पढ़वाई गई। प्रेमचंद ने उसे ‘हंस’ में छापा| यह मेरे लिए बहुत बड़ा प्रोत्साहन था। मैं सोचने लगा शायद मुझमें कहानीकार के बीज हैं और मैं अभ्यास करता जाऊँ तो संभव है मैं किसी दिन कहानी के क्षेत्र में अपने लिए कोई स्थान बना सकूँ। साथ ही कविताओं के लिए प्रेरित करने को भी मेरे पास कम न था। मेरी कविताओं को देखने वाले इने-गिने थे, घर पर शायद श्यामा अकेली, निकट के मित्रों में केवल महेश, दूर के मित्रों में केवल श्री कृष्ण सूरी, मेरे कहानीकार से मेरा कवि अधिक संकोचशील था। श्यामा की शिक्षा घर पर ही हुई थी – थोड़ी हिंदी की, थोड़ी अंग्रेज़ी की, एक ईसाई महिला उसको और उसकी चचेरी बहनों को पढ़ाने आती थी। पढ़ने का उसे शौक़ था, कविता का भी, जो विशेषकर मेरे संपर्क से और बढ़ा। कविता की कोई अच्छी पुस्तक मैं देखता तो उसे खरीद लाता, उसे भेंट कर देता, वह खुद पढ़ती, अक्सर तो उसकी लंबी-लंबी बीमारियों में मैं ही उसे पढ़कर सुनाता। महेश मेरी कविताओं को पसंद करते, सुरी मेरी कविताओं की प्रशंसा करते, और श्यामा चाहती कि मैं सदैव कविता में डूबा रहूँ। कविता में मेरा भविष्य शायद ही उसने देखा होगा, पर इतना तो उसने अनुभव ही किया होगा कि काव्य सृजन में ही मेरा मन कुछ शांति, कुछ मुक्ति पाता है, जो अन्यथा उद्विग्न, उद्भ्रांत अथवा अशांत रहता है। शायद अब भी मनःशक्तियों का पूर्ण केंद्रीकरण, तन्मयता, तल्लीनता, परिपूर्ण आत्म-विस्मरण मैं काव्य-सृजन के ही क्षणों में जानता हूँ – जिसे अब मैं ‘समाधि’ कहने लगा हूँ। जब मैं अपनी अनुभूतियों में जीता हूँ – कला के माध्यम से अनुभूतियों को जीना शायद जीने से अधिक घनत्व से. तीव्रता से, गहराई से जीना है – तब मैं सारे संसार के लिए मर जाता हूँ, और मैं चाहता हूँ कि कोई कुछ भी ऐसा न करे जिससे मैं संसार में जीने के प्रति सचेत हो जाऊँ, जब तक कि मेरी ही ‘समाधि’ न टूटे। और उन दिनों मेरी ‘समाधि’ में किसी प्रकार की बाधा न बनने का श्यामा ने सब तरह से प्रयत्न किया। स्कूल या विद्यापीठ पढाने में निश्चय मुझे उससे ज्यादा समय लगाना पड़ता था जितना यूनिवर्सिटी में पढ़ाने में, ट्यूशनें दो या तीन मुझे अब भी करनी पड़ती थीं, फिर भी अपने पढने-लिखने के लिए मेरे पास काफ़ी समय था। सुबह जल्दी जागने, रात को देर से सोने का लंबा अभ्यास अब आदत बन गया था।

लगभग चार वर्ष अपने विविधतापूर्ण स्वाध्याय के अतिरिक्त मैं कहानियाँ भी लिखता रहा, कविताएँ भी लिखता रहा – जैसे कवि और कहानीकार दोनों मेरे अंदर परस्पर संघर्ष कर रहे हों और अभी तक मैं निश्चय न कर सका हूँ कि विजय का सेहरा किसके माथे बाँधूँ। कुछ कविताएँ-कहानियाँ पत्रों में भी छपीं मैंने कहानियों का एक संग्रह तैयार किया। जैसे नए लेखकों के मन में प्रायः यह कमज़ोरी होती है कि कोई बड़ा आदमी उनकी कृति की भूमिका लिख देगा तो प्रकाशक उसे फौरन छाप देगा, मुझमें भी थी। मैंने उसकी भूमिका डॉ. धीरेन्द्र वर्मा से लिखाई। ज़मीन से उड़कर मैं पेड़ की डाल पर, फुनरगी पर नहीं, एकदम पहाड़ की चोटी पर बैठकर चहकना चाहता था। मैंने अपना संगह प्रकाशित करने के लिए प्रस्तुत किया ‘हिंदुस्तानी अकादमी’ को। कुछ दिनों बाद अकादमी ने प्रकाशित करने में असमर्थता व्यक्त करके संग्रह लौटा दिया। निराश होना स्वाभाविक था। पहले तो मैंने डॉ. धीरेन्द्र वर्मा की भूमिका फाड़ी, फिर कहानियाँ फाड़कर रद्दी की टोकरी में डाल दीं। चौदह वर्षों बाद जब भारती भंडार ने मेरी प्रारंभिक रचनाओं को छापना चाहा तो मुझे उन्हें पत्र-पत्रिकाओं से, अपने पुराने कागजों के फ़र्स्ट ड्राफ्टों से फिर से तैयार करने में काफ़ी परेशानी उठानी पड़ी। शायद उसी दिन मेरे मन ने यह निर्णय लिया था कि मैं कहानीकार नहीं बन सकता, अब कविता की दिशा को अपनाऊँ। संग्रह प्रकाशित हो जाता तो उसका प्रोत्साहन शायद मुझे कहानी, उपन्यास के क्षेत्र में बढ़ने को प्रेरित करता। जीवन की ऐसी आकस्मिक घटनाएँ ही वास्तव में जीवन को दिशा देती है, और जिसे हम ‘नियति ‘ का गंभीर-सा नाम देते हैं वह शायद बहुत नगण्य-सी लगने वाली घटनाओं से अपने बड़े-बड़े लक्ष्य प्राप्त करती रहती है। क्या मेरे अंदर का कहानीकार मर गया? मरता जीवन में कुछ भी नहीं, केवल रूप बदलता है। कहानीकार मेरे कवि में आत्मसात् हो गया। ऐसा मेरे बहुत-से पाठक मुझसे कहते हैं कि मेरी बहुत-सी कविताओं के पीछे किसी कहानी की कल्पना कर लेना कठिन नहीं है। कुछ लोगों ने मेरी कतिपय कविताओं को लेकर वास्तव में कहानियाँ गढी हैं, वे छपी भी हैं। बहरहाल, उस दिन के बाद मैंने केवल एक कहानी लिखी, अगर कहानी उसे कह सकते हों तो जो ‘निशा निमंत्रण’ के आरंभ में है।

कविताओं के भी मैंने कई संकलनों की कल्पना कर डाली थी और उन्हें अलग-अलग कापियों में लिखकर श्री कृष्ण सूरी के पास भेज दिया था। पहला संग्रह ‘तेरा हार’ के नाम से छपाना चाहता था। उन्हीं दिनों मुंशी कन्हैयालाल के संपादन में श्री शुकदेव प्रसाद ‘बिस्मिल’ इलाहाबादी का उर्दू संगह ‘दीवाने बिस्मिल’ के नाम से शायद इंडियन प्रेस से प्रकाशित हुआ था। मेरा आना-जाना मुंशी कन्हैयालाल के यहाँ था ही, जिनको हम घर पर बुचुन दादा कहते थे। मैंने उनके सामने अपनी इच्छा प्रकट की। उन्होंने मेरी ओर से कटरा के रामनारायण लाल पब्लिशर और बुकसेलर से बात की। वे मेरा संकलन छापने को तैयार हो गए, शर्त यह रक्खी कि एक हजार प्रतियाँ छापेंगे, मगर रायल्टी कुछ न देंगे, सिर्फ ढाई सौ प्रतियाँ भेंट स्वरूप मुझे दे देंगे, दाम एक रु. होगा, मैं चाहे बेच लूँ, चाहे बाँट दूँ। यश के लोभ ने अर्थ के लाभ पर विजय पाई। मैंने प्रकाशक की शर्त स्वीकार कर ली। संपादक की जगहः पर – हालाँकि इसकी ज़रूरत नहीं थी- मुंशी कन्हैयालाल एम.ए.., एल.एल.बी. का नाम छपा – गोकि संपादन उन्होंने एक अक्षर का न किया था, मैं स्वीकार करूँगा, मेरी इच्छा से- ‘रचयिता’ के न-कुछ-से हल्के नाम ‘बच्चन’ को संपादक के एक भारी, डिग्रीधारी नाम का सहारा और वज़न देने के लिए। प्रारंभिक ‘संबोधन’ में भी पता उनके निवास ‘कृष्ण-कुंज ‘ का दिया गया। जिस दिन पुस्तक प्रकाशित हो गई, शायद सन्, 32 की जनवरी का पहला सप्ताह था, मैं प्रकाशक के यहाँ अपनी प्रतियाँ लेने गया। मुझे ढाई सौ प्रतियों का बंडल दे दिया गया और उसे अपने कंधे पर रखकर मैं ऐसे ही गर्व से चला जैसे पक्षिराज गरुड़ भगवान विष्णु को अपनी पीठ पर बिठाकर उड़े जा रहे हों – हाँ, मैं उड़ा ही जा रहा था, मेरे पैर जैसे धरती पर नहीं पड़ रहे थे। मेरी सर्वप्रथम कृति प्रकाशित हो गई! पहली बार अनुभूति हुई कि कवि की पहली रचना का प्रकाशन उसके लिए उतना ही रोमप्रहर्षक होता है जितना प्रेयसी का प्रथमालिंगन!

हरिवंश राय बच्चन

हरिवंश राय बच्चन (27 नवम्बर 1907 – 18 जनवरी 2003) हिंदी भाषा के लोकप्रिय कवि और लेखक थे। बच्चन हिन्दी कविता के उत्तर छायावाद काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति ‘मधुशाला’ है। उनकी कृति ‘दो चट्टानों’ को 1968 में हिन्दी कविता के साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। बच्चन को भारत सरकार द्वारा 1976 में साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।

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