खोया हरा सुग्गा

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जैसे हाथ से दमड़ी खो जाती है
जैसे खेलते वक्त निशाना मारने पर कभी-कभी टन्ना खो जाता है
जैसे अंगुलियों से रेंड़ी छूट जाती है
जैसे देखते ही देखते हवा में उड़ जाता है रुई का फाहा
जैसे गाँठ में बँधी किसी की कमाई खो जाती है
जैसे नीम के पत्तों से नीम का फूल खो जाता है
जैसे गौरेया के चोंच से कभी-कभी छूट जाता है तिनका

जैसे हिरण की राह बिछुड़ जाती है
जैसे पानी में सिक्का खो जाता
वैसे तुम मत खोना

जब सब कुछ खो रहा हो आज के वक्त
और कहते हैं कि खोई चीजें कभी मिलती नहीं
पर अगर तुम्हें मजबूरी में खोना भी पड़े
तो खोकर मिल जाना

ज्यों अनार के पेड़ को कई बार मिल जाता है
उसका खोया हरा सुग्गा

जैसे एक अगहन में नहीं तो दूसरे अगहन में
बाजरे के डाँठ को
उसका अपना गौरेया मिल जाता है
जैसे टूट रहे सपने को नींद मिल जाती है
और उदास आकाश को
मिल जाता है
उसका शुक्रतारा।

बद्रीनारायण

बद्रीनारायण हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि हैं। उन्हें हिंदी कविता में अपने विशिष्ट योगदान के कारण केदार सम्मान से सम्मानित किया गया है।

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