हम जिएँ न जिएँ दोस्त

हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो एक नौजवान की तरह, खेत में झूम रहे धान की तरह, मौत को मार रहे बान की तरह। हम जिएँ न जिएँ दोस्त तुम जियो

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फटा क्षण

एक फटे हुए क्षण में जूता सिलाने मैं चला सड़क चौड़ी थी पाँव पतले नंबर तीन वाले पेड़ सिकुड़ा खड़ा बूढ़ा बैठा जहाँ दिमाग़ में कुछ आता न था कमरा खुला दरियाँ

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रात सुनसान है

रात सुनसान है तारीक़ है दिल का आंगन आसमां पर कोई तारा न जमीं पर जुगनू टिमटिमाते हैं मेरी तरसी हुई आँखों में कुछ दीये तुम जिन्हें देखोगे तो कहोगे : आंसू

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अत्यंज कोरी पासी हैं हम

अत्यंज कोरी पासी हैं हम क्यूँ कर भारतवासी हैं हम अपने को क्यों वेद में खोजें क्या दर्पण विश्वासी हैं हम छाया भी छूना गर्हित है ऐसे सत्यानाशी हैं हम धर्म के

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दुःख से कैसा छल

मूरख है कालीघाट का पंडित सोचता है मंत्रोचार से और लाल पुष्पों से ढक लेगा पाप नहीं फलेगा कुल गोत्र के बहाने कृशकाय देह का दुःख मूरख है ममता बंदोपाध्याय का रसोइया

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धर्म बच जाए शायद

एक व्यक्ति के क़त्ल के बाद माँ रोती है पूरा अस्तित्व रोता है साथ में आदम और हव्वा रोते हैं अपने नस्लों के हश्र पर इन सबमें शामिल हैं ईश्वर के आंसू

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तब तुम्हारी निष्ठा क्या होती

यदि वेदों में लिखा होता ब्रह्म के पैर से हुए हैं पैदा। उन्हें उपनयन का अधिकार नहीं। तब, तुम्हारी निष्ठा क्या होती? यदि धर्मसूत्रों में लिखा होता तुम ब्राह्मणों, ठाकुरों और वैश्यों

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मेरे पुरखे

तुमने कहा— ब्रह्मा के पाँव से जन्मे शूद्र और सिर से ब्राह्मण उन्होंने पलट कर नहीं पूछा— ब्रह्मा कहाँ से जन्मा? तुमने कहा— सेवा ही धर्म है शूद्र का उन्होंने नहीं पूछा—

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शूद्र आदमी

तीन आदमियों के आगे भोजन की थाली है चौथे के आगे थाली ख़ाली है तीन आदमियों के बदन पर रेशमी परिधान है चौथे का बदन उघड़ा है तीन आदमियों के बिस्तर बंगलों

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