स्त्रियाँ घर लौटती हैं

स्त्रियाँ घर लौटती हैं पश्चिम के आकाश में उड़ती हुई आकुल वेग से काली चिड़ियों की पांत की तरह स्त्रियों का घर लौटना पुरुषों का घर लौटना नहीं है पुरुष लौटते हैं

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जंगली कलहंस

तुम्हें अच्छा बनने की कोई ज़रूरत नहीं तुम्हें अपने घुटनों पर आने की ज़रूरत नहीं रेगिस्तान में सैकड़ो मील चलकर पछताते हुए तुम्हें बस अपनी देह के कोमल पशु को छोड़ देना

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धूप की नदी

मैं कब से बैठा हूँ अंधेरे के इस पहाड़ की तलहटी में, अभी अभी गुज़रे हैं इधर से कुछ उद्दंड अश्वारोही अपनी तलवारों पर हाथ फेरते बेहद फूहड़ और भयानक हंसी के

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किसी एक रोज़

कलम छूटने से पूर्व कवि को चुन लेना चाहिए एक उत्तराधिकारी ; सौंप देनी चाहिए अपनी अधूरी कविताएँ जैसे हम घोषित करते हैं वसीयत में अपने मनपसंद वारिस का नाम अकाल-गंध पर

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भरोसा

सपना टूटता है, आँख नहीं टूटती टूटती है नींद, रात नहीं टूटती। साँस टूटती है, हवा नहीं पत्ते टूटते हैं, छाया नहीं फूल टूटते हैं, ख़ुशबू नहीं टूटती। गिलास टूटता है, पानी

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ख़ामोश चिंताएँ

आठ बज गए। दूधवाले का अभी तक कोई अतापता नहीं था। पानी धुंआधार बरस रहा था। बादल जैसे आज ही गरज-बरस कर साल भर का कोटा पूरा करने पर आमादा थे। माया

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निज़ार क़ब्बानी की कविताएँ

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1. लालटेन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है प्रकाश नोटबुक से ज्यादा महत्वपूर्ण होती हैं कविताएँ और होठों से ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं चुम्बन तुम्हारे लिए लिखे गए मेरे ख़त ज्यादा महत्वपूर्ण हैं

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राख हो जाए यह दुनिया

हमारे तलवे में है चक्कर कि हमें घूमना है घर भर की धुरी पर बिना नागा अपने भीतर की आग को बचा कर रखना है चूल्हे भर में अपने सपनों को बेलना

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बंटू ने भगाया राक्षस

आज बंटू बहुत ख़ुश था क्योंकि आज वह अपने परिवार के साथ हिल स्टेशन पर पिकनिक मनाने जा रहा था। सुबह बहुत जल्दी वह सब निकल गए। जैसे-जैसे हिल स्टेशन नज़दीक आ रहा

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