बंटू ने भगाया राक्षस

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आज बंटू बहुत ख़ुश था क्योंकि आज वह अपने परिवार के साथ हिल स्टेशन पर पिकनिक मनाने जा रहा था। सुबह बहुत जल्दी वह सब निकल गए। जैसे-जैसे हिल स्टेशन नज़दीक आ रहा था प्रकृति के मनोरम दृश्य दिखाई देने लगे। एक तरफ गहरी ख़ाई और दूसरी तरफ़ ऊँची पहाड़ियाँ। बंटू बहुत रोमांचित हो रहा था।

“ओह देखो! इन सुंदर पहाड़ियों पर भी इतनी गंदगी।” दादाजी ने गाड़ी की खिड़की से बाहर देखकर कहा।

“पता नहीं कब समझेंगे लोग। क्यों राक्षस को जीवित कर रहे हैं।”

दादाजी के मुँह से राक्षस शब्द सुनकर बंटू डर जाता है और दादी की गोद में चिपक जाता है।

“क्या हुआ बंटू?” दादी ने पूछा।

“दादी, क्या राक्षस सच में होते हैं?” बंटू ने दादी से धीरे से सवाल किया।

“हाँ होते है।” दादी ने बंटू के सिर को सहलाते हुए कहा।

“क्या वह यहाँ भी आ जाएँगे?” बंटू ने पूछा।

“आप ऐसा क्यों पूछ रहे हो?” इस बार दादाजी ने बंटू को कहा।

“क्योंकि अभी आपने बोला था कि राक्षस जिंदा हो जायेगा।” बंटू डरते हुए बोला।

“आओ बताता हूँ।” बंटू को अपनी गोदी में बिठाकर दादा जी ने ख़ाई की तरफ़ इशारा किया। गाड़ी पहाड़ी होने की वज़ह से धीरे चल रही थी और ख़ाई में पड़ी हुई पॉलीथिन और ख़ाली बोतलें जगह-जगह दिख रही थीं।

“देखो बंटू वहाँ पड़े हुए पॉलीथिन और प्लास्टिक की बोतलों के कूड़े को।” दादाजी ने ऊंगली से इशारा करते हुए कहा।

“दादाजी यह कूड़ा राक्षस ने किया है। मतलब यहाँ पर राक्षस है!” भय मिश्रित आश्चर्य से उसने दादाजी को कहा।

“नहीं बेटा। यह सब राक्षस ने नहीं किया। यह सब तो यहाँ पर घुमने आने वाले लोगों ने किया है।”

“बेटा यदि हम गंदगी करेंगे तो प्रदूषण फैलेगा, पर्यावरण को नुक़सान होगा और प्रदूषण का राक्षस जिंदा हो जायेगा।”

“तो क्या प्रदूषण का राक्षस दिखाई देगा दादाजी! वह हमें खा जायेगा?” डरते हुए बंटू ने कहा।

“बेटा वह दिखाई नहीं देता लेकिन वह बहुत सारी बीमारियाँ फैला देता है और इन बीमारियों से लोग मर जाते हैं।”

“तो हमें क्या करना चाहिए दादाजी?” बंटू ने पूछा।

“बस इतना ही कि हमें पॉलीथिन का प्रयोग नहीं करना चाहिए और साथ ही कूड़े को यहाँ वहाँ नहीं फेकना चाहिए।”

“हमेशा कूड़ा कूडेदान में ही डालना चाहिए ताकि सब जगह सफ़ाई रहे। सफ़ाई से प्रदूषण का राक्षस मर जाता है और हमें कोई नुक़सान नहीं होता।” दादाजी ने बंटू से कहा।

“अच्छा दादाजी! मैं समझ गया। हमें गंदगी नहीं फैलानी चाहिए। मैं सब दोस्तों को प्रदूषण राक्षस के बारे में बताऊँगा।” बंटू ने चहकते हुए कहा।

हिल स्टेशन आ गया था पापा ने गाड़ी रोक दी। सभी लोग गाड़ी से सामान उतारने लगे। मम्मी ने चादर बिछा दी। सब उस पर आराम करने लगे। तभी बंटू की नज़र झाड़ियों के पास पड़े चिप्स के रैपर्स और कोल्ड ड्रिंक की बोतलों पर पड़ी। वह भागकर वहाँ गया और उन्हें उठाकर कूड़ेदान में डाल देता है।

“मैंने प्रदूषण के राक्षस को मार दिया दादाजी और अब उसे कभी नहीं आने दूँगा।” दादाजी के पास जाकर बंटू ने कहा।

“शाबाश बंटू!” कहकर दादाजी ने उसे गले लगा लिया।

 

दिव्या शर्मा

दिव्या शर्मा देहरादून, उत्तराखंड से हैं। आप इन दिनों विश्व भाषा अकादमी, हरियाणा में महासचिव व युग-युगांतर पत्रिका में सह-संपादिका के रूप ने सेवारत हैं। आपको रचनाएँ समय समय पे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। आपसे sharmawriterdivya@gmail.com पे बात की जा सकती है।

दिव्या शर्मा देहरादून, उत्तराखंड से हैं। आप इन दिनों विश्व भाषा अकादमी, हरियाणा में महासचिव व युग-युगांतर पत्रिका में सह-संपादिका के रूप ने सेवारत हैं। आपको रचनाएँ समय समय पे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं। आपसे sharmawriterdivya@gmail.com पे बात की जा सकती है।

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