आख़िरी कविता

जा रहा हूँ मैं बुद्ध इस दलहीन बौद्ध मठ से जा रहा हूँ आनंद या दुःख में पता नहीं चला जा रहा हूँ मैं चला जा रहा हूँ मुंबई, दिल्ली और कलकत्ते

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मैं कृतज्ञ हूँ

नहीं हूँ किसी का भी प्रिय कवि मैं ज़रा देर से ही सही मुझे यह ज्ञात हुआ आज मैं कृतज्ञ हूँ जाने-अनजाने हर किसी का और यह हर किसी का व्यूह मुझे

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कुछ परिभाषाएं

जो जितने ज़्यादा लोगों का जितना ज़्यादा नुक़सान कर सके वो उतना ही बड़ा है। छोटा वो है जो किसी का नुक़सान न कर सके। उस हर बात में राजनीति है जहाँ

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अज्ञेय की खोज में

इस सरपट भागती दुनिया में कुछ भी पा लेना मुश्किल है अब मुश्किल है ये कहना कि हद के पार और सरहद के पार में मनुष्यता का ज़्यादा नाश कहाँ है, पुनर्जागरण को पहुँचने में

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जहाँ तुम नहीं थे

तुम नहीं थे एक ख़ालीपन था गहरे पग-चिह्न लिए दूर तक रेत थी और कुछ भी नहीं था जहाँ मैं थी वहाँ मैं नहीं थी बची हुई नमी लिए लुप्त होती एक

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कहाँ हो तुम

अँधेरा बढ़ रहा त्रासद अंधेरा है यह और हम प्रतीक्षारत रोशनी में डूब कर पढ़े जाने के लिए प्रस्तुत प्रतीक्षा को पढ़ने के लिए चाहिए एक जीवन का सन्नाटा सन्नाटे को साधने

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जवान होती लड़की

एक जवान होती लड़की केवल देह होती है सावन चढ़े आकाश के नीचे पूरा भूगोल होती है एक उमड़ी-सी नदी – डगमगाती नाव को भरमाती भँवर होती है दूरागत लोक धुनि की

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प्रभो!

विमल इन्दु की विशाल किरणें प्रकाश तेरा बता रही हैं अनादि तेरी अनंत माया जगत को लीला दिखा रही हैं प्रसार तेरी दया का कितना ये देखना हो तो देखे सागर तेरी

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पिन बहुत सारे

जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे। इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है ‘पिन-कुशन’ जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया

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चुप्पियाँ

हम थोड़ा और अधिक झुठला सकते थे अपने होने को किंतु हमने उतना होना भर झुठलाया जितने में हम पूर्ण संत न बन सकें पूर्णताओं की इच्छा रह-रह कर उबाले लेती हैं

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