प्रेतकल्प

ओ समय! किस घाट पर खड़े हो अन्यमनस्क किस प्रतीक्षा की देहरी पर टिके हो ध्यानापन्न कहाँ ले जाओगे इतना बड़ा न्यायशास्त्र ढोकर अपनी रीढ़ पर चल रहे हो या क्लांत पड़े

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महामारी के दिनों में

जिल्द की सबसे छोटी कहानी कभी यह शिकायत नहीं करती कि लम्बी कहानी ने उसका हक़ मार लिया एक छोटी ज़िन्दगी का सत्व सौ साल जीने वाला कोई चुरा नहीं सकता। आज

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प्रेम

उन रास्तों से मैं कभी नहीं आना चाहता था जहाँ लिखा था कि प्रेम यही उत्पन्न हुआ वहाँ तुम्हारी तासीर थी और एक अनकही गन्ध जो बांधे रही समय दर समय कितनी

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नाचती हुई स्त्री

नाचती हुई स्त्री घूमती हुई पृथ्वी है जिसके पैरों में बँधे हैं दिन और रात जिसके हाव-भाव और मुद्राओं के साथ बदलते हैं मौसम पृथ्वी का केंद्रबिंदु है बैली डांस करती स्त्री की

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एक कवि कहता है

नामुमकिन है यह बतलाना कि एक कवि कविता के भीतर कितना और कितना रहता है एक कवि है जिसका चेहरा-मोहरा, ढाल-चाल और बातों का ढब भी उसकी कविता से इतना ज्यादा मिलता-जुलता

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स्त्री

स्त्री के अंदर अगर झाँक सको तो देखना वहाँ असंख्य कविताएँ आज भी दम तोड़ रही हैं चूल्हे की भट्टी परिवार की जिम्मेदारी बच्चों के प्रति ख़ुद का समर्पण इन सबों की

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छूट गयी स्त्रियाँ

वे छूट गयी स्त्रियाँ हैं जिनकी देह से पोंछा जा रहा है योद्धाओं का पसीना एक सभ्यता के ख़ात्मे के बाद उनकी रक्तरंजित कोख से मनवांछित नस्ल उगाई जाएगी वे छूट गयी

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नूर मियाँ

आज तो चाहे कोई विक्टोरिया छाप काजल लगाये या साध्वी ऋतंभरा छाप अंजन लेकिन असली गाय के घी का सुरमा तो नूर मियाँ ही बनाते थे कम से कम मेरी दादी का

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वो आएगी हर ओर से

वो आएगी हर ओर से और तुम रोक न सकोगे उसका आना तय था इतिहास में कुलबुलाहट थी तुमने हर ग्रंथ में ख़ुद तय किया था कि वो उतरेगी सड़कों पर तुम्हारे

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