मेरे पुरखे

तुमने कहा— ब्रह्मा के पाँव से जन्मे शूद्र और सिर से ब्राह्मण उन्होंने पलट कर नहीं पूछा— ब्रह्मा कहाँ से जन्मा? तुमने कहा— सेवा ही धर्म है शूद्र का उन्होंने नहीं पूछा—

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शूद्र आदमी

तीन आदमियों के आगे भोजन की थाली है चौथे के आगे थाली ख़ाली है तीन आदमियों के बदन पर रेशमी परिधान है चौथे का बदन उघड़ा है तीन आदमियों के बिस्तर बंगलों

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जवान होते बेटों 

जवान होते बेटों ! इतना झुकना इतना कि समतल भी ख़ुद को तुमसे ऊँचा समझे कि चींटी भी तुम्हारे पेट के नीचे से निकल जाए लेकिन झुकने का कटोरा लेकर मत खड़े

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डिबेट

मुझे डर लगता है कि किसी दिन वे मुझे डेथ सर्टिफिकेट थमा देंगें। आप जो हैं वह आप नहीं हैं, कहकर वो मुझे अख़बारों में मुखाग्नि न दे दें। कहीं किसी न्यूज़

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अजायबघर

पृथ्वी कितनी छोटी थी जब हमारे पास मिलने की आकांक्षा थी। आकांक्षाएं  सिमटती रहीं और एक दिन बहुत दूर हो गए हमसे हमारे ही शहर। एक तरह का अजनबीपन बस गया है

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आख़िरी कविता

जा रहा हूँ मैं बुद्ध इस दलहीन बौद्ध मठ से जा रहा हूँ आनंद या दुःख में पता नहीं चला जा रहा हूँ मैं चला जा रहा हूँ मुंबई, दिल्ली और कलकत्ते

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मैं कृतज्ञ हूँ

नहीं हूँ किसी का भी प्रिय कवि मैं ज़रा देर से ही सही मुझे यह ज्ञात हुआ आज मैं कृतज्ञ हूँ जाने-अनजाने हर किसी का और यह हर किसी का व्यूह मुझे

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कुछ परिभाषाएं

जो जितने ज़्यादा लोगों का जितना ज़्यादा नुक़सान कर सके वो उतना ही बड़ा है। छोटा वो है जो किसी का नुक़सान न कर सके। उस हर बात में राजनीति है जहाँ

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अज्ञेय की खोज में

इस सरपट भागती दुनिया में कुछ भी पा लेना मुश्किल है अब मुश्किल है ये कहना कि हद के पार और सरहद के पार में मनुष्यता का ज़्यादा नाश कहाँ है, पुनर्जागरण को पहुँचने में

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जहाँ तुम नहीं थे

तुम नहीं थे एक ख़ालीपन था गहरे पग-चिह्न लिए दूर तक रेत थी और कुछ भी नहीं था जहाँ मैं थी वहाँ मैं नहीं थी बची हुई नमी लिए लुप्त होती एक

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