क्षीण ध्वनि

कौन दुःख के इन सदाबहार फूलों को खाद-पानी देता है! मेरे भीतर एक क्षीण ध्वनि कराहती है “उसकी याद ही तो” मेरे चित्त के अरण्य में मेरी ही आत्मा का कोलाहल किसका

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रात ढलने के बाद क्या होगा

रात ढलने के बाद क्या होगा दिन निकलने के बाद क्या होगा सोचता हूँ कि उस से बच निकलूँ बच निकलने के बाद क्या होगा ख़्वाब टूटा तो गिर पड़े तारे आँख

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बेजगह

“अपनी जगह से गिर कर कहीं के नहीं रहते केश, औरतें और नाख़ून” – अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे हमारे संस्कृत टीचर। और मारे डर के जम जाती थीं हम

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तुम लौटना

तुम लौटना यह साल वापसी का है बिछड़े अय्यार प्रेम के पुनर्वास का मुझे उम्मीद है, तुम आओगे और सब ठीक हो जाएगा तुम्हारे छूने भर से दारुणता समाप्त हो जाएगी जर्जर

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उलगुलान की औरतें

वे उतनी ही लड़ाकू थीं जितना कि उनका सेनापति वे अपनी ख़ूबसूरती से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थीं अपने जूड़े में उन्होंने सरहुल और ईचा बा की जगह साहस का फूल खोंसा था

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नींव की ईंट हो तुम दीदी

पीपल होतीं तुम पीपल, दीदी पिछवाड़े का, तो तुम्हारी खूब घनी-हरी टहनियों में हारिल हम बसेरा लेते हारिल होते हैं हमारी तरह ही घोंसले नहीं बनाते कहीं बसते नहीं कभी दूर पहाड़ों

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प्रसिद्धि

“ये कहानी है?”…. नव्या की लिखी रचना को प्रकाशक फेंकते हुए बोला। “ना कोई रस ना आकर्षण।” “मैं समझी नहीं सर …कैसा आकर्षण?” “एक सच्चे प्रेम पर कुछ लिखने की कोशिश की

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कलगी बाजरे की

हरी बिछली घास। दोलती कलगी छरहरे बाजरे की। अगर मैं तुम को ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता, या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुँई, टटकी

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ऑनलाइन युग में युवा कवि

1. मुश्किल इस युग में जितना आसान है कवि बनना उससे भी ज़्यादा सहूलियत भरा किनारे कर दिया जाना युद्ध के बाद भूखी भीड़ टूट पड़ी है आसमान से बरसती सहायता पर

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चुनाव

बहुत सारे सच और बहुत सारे झूठ सुनने के बाद इतना तय हुआ दुनिया दोनों के साथ चलेगीचुनाव जिसे आपत्ति है वह दर्ज़ करवाए मेरा अपना कुछ नहीं था मुझे तो बस

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