मूँद लो आँखें

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कविता : मूँद लो आँखें

मूँद लो आँखें
शाम के मानिंद
ज़िन्दगी की चार तरफ़ें
मिट गई हैं
बंद कर दो साज़ के पर्दे
चाँद क्यों निकला, उभरकर…?
घरों में चूल्हे
पड़े हैं ठंडे
क्यों उठा यह शोर ?
किसलिए यह शोर ?

छोड़ दो संपूर्ण–प्रेम,
त्याग दो सब दया–सब घृणा
ख़त्म हमदर्दी
ख़त्म —
साथियों का साथ

रात आएगी
मूँदने सबको ।

शमशेर बहादुर सिंह
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शमशेर बहादुर सिंह (1911 - 1993) आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं। हिंदी कविता में अनूठे माँसल एंद्रीए बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। तार सप्तक से शुरुआत कर चुका भी नहीं हूँ मैं के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।

शमशेर बहादुर सिंह (1911 - 1993) आधुनिक हिंदी कविता की प्रगतिशील त्रयी के एक स्तंभ हैं। हिंदी कविता में अनूठे माँसल एंद्रीए बिंबों के रचयिता शमशेर आजीवन प्रगतिवादी विचारधारा से जुड़े रहे। तार सप्तक से शुरुआत कर चुका भी नहीं हूँ मैं के लिए साहित्य अकादमी सम्मान पाने वाले शमशेर ने कविता के अलावा डायरी लिखी और हिंदी उर्दू शब्दकोश का संपादन भी किया।

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