कलगी बाजरे की

हरी बिछली घास। दोलती कलगी छरहरे बाजरे की। अगर मैं तुम को ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता, या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुँई, टटकी

More

ऑनलाइन युग में युवा कवि

1. मुश्किल इस युग में जितना आसान है कवि बनना उससे भी ज़्यादा सहूलियत भरा किनारे कर दिया जाना युद्ध के बाद भूखी भीड़ टूट पड़ी है आसमान से बरसती सहायता पर

More

चुनाव

बहुत सारे सच और बहुत सारे झूठ सुनने के बाद इतना तय हुआ दुनिया दोनों के साथ चलेगीचुनाव जिसे आपत्ति है वह दर्ज़ करवाए मेरा अपना कुछ नहीं था मुझे तो बस

More

प्रेतकल्प

ओ समय! किस घाट पर खड़े हो अन्यमनस्क किस प्रतीक्षा की देहरी पर टिके हो ध्यानापन्न कहाँ ले जाओगे इतना बड़ा न्यायशास्त्र ढोकर अपनी रीढ़ पर चल रहे हो या क्लांत पड़े

More

महामारी के दिनों में

जिल्द की सबसे छोटी कहानी कभी यह शिकायत नहीं करती कि लम्बी कहानी ने उसका हक़ मार लिया एक छोटी ज़िन्दगी का सत्व सौ साल जीने वाला कोई चुरा नहीं सकता। आज

More

प्रेम

उन रास्तों से मैं कभी नहीं आना चाहता था जहाँ लिखा था कि प्रेम यही उत्पन्न हुआ वहाँ तुम्हारी तासीर थी और एक अनकही गन्ध जो बांधे रही समय दर समय कितनी

More

नाचती हुई स्त्री

नाचती हुई स्त्री घूमती हुई पृथ्वी है जिसके पैरों में बँधे हैं दिन और रात जिसके हाव-भाव और मुद्राओं के साथ बदलते हैं मौसम पृथ्वी का केंद्रबिंदु है बैली डांस करती स्त्री की

More

एक कवि कहता है

नामुमकिन है यह बतलाना कि एक कवि कविता के भीतर कितना और कितना रहता है एक कवि है जिसका चेहरा-मोहरा, ढाल-चाल और बातों का ढब भी उसकी कविता से इतना ज्यादा मिलता-जुलता

More

स्त्री

स्त्री के अंदर अगर झाँक सको तो देखना वहाँ असंख्य कविताएँ आज भी दम तोड़ रही हैं चूल्हे की भट्टी परिवार की जिम्मेदारी बच्चों के प्रति ख़ुद का समर्पण इन सबों की

More

छूट गयी स्त्रियाँ

वे छूट गयी स्त्रियाँ हैं जिनकी देह से पोंछा जा रहा है योद्धाओं का पसीना एक सभ्यता के ख़ात्मे के बाद उनकी रक्तरंजित कोख से मनवांछित नस्ल उगाई जाएगी वे छूट गयी

More
1 19 20 21 22 23 68