हरी बिछली घास। दोलती कलगी छरहरे बाजरे की। अगर मैं तुम को ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता, या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुँई, टटकी
More1. मुश्किल इस युग में जितना आसान है कवि बनना उससे भी ज़्यादा सहूलियत भरा किनारे कर दिया जाना युद्ध के बाद भूखी भीड़ टूट पड़ी है आसमान से बरसती सहायता पर
Moreजिल्द की सबसे छोटी कहानी कभी यह शिकायत नहीं करती कि लम्बी कहानी ने उसका हक़ मार लिया एक छोटी ज़िन्दगी का सत्व सौ साल जीने वाला कोई चुरा नहीं सकता। आज
Moreनाचती हुई स्त्री घूमती हुई पृथ्वी है जिसके पैरों में बँधे हैं दिन और रात जिसके हाव-भाव और मुद्राओं के साथ बदलते हैं मौसम पृथ्वी का केंद्रबिंदु है बैली डांस करती स्त्री की
Moreनामुमकिन है यह बतलाना कि एक कवि कविता के भीतर कितना और कितना रहता है एक कवि है जिसका चेहरा-मोहरा, ढाल-चाल और बातों का ढब भी उसकी कविता से इतना ज्यादा मिलता-जुलता
Moreवे छूट गयी स्त्रियाँ हैं जिनकी देह से पोंछा जा रहा है योद्धाओं का पसीना एक सभ्यता के ख़ात्मे के बाद उनकी रक्तरंजित कोख से मनवांछित नस्ल उगाई जाएगी वे छूट गयी
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