बोलने में कम से कम बोलूँ कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ इतना कम कि किसी दिन एक बात बार-बार बोलूँ जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। मेरे अधिकतम चुप को
Moreकौन दुःख के इन सदाबहार फूलों को खाद-पानी देता है! मेरे भीतर एक क्षीण ध्वनि कराहती है “उसकी याद ही तो” मेरे चित्त के अरण्य में मेरी ही आत्मा का कोलाहल किसका
Moreउम्मीदें, साहित्यिक वेब पत्रिका ने अभी हाल ही में (दिनांक – 30/08/21, सोमवार)अपने दूसरे वर्कशॉप का आयोजन किया, जिसका विषय : ‘कथा-कहानी- क़िस्सा’ रखा गया था। वर्कशॉप में वरिष्ठ कथाकार श्री अवधेश
Moreरात ढलने के बाद क्या होगा दिन निकलने के बाद क्या होगा सोचता हूँ कि उस से बच निकलूँ बच निकलने के बाद क्या होगा ख़्वाब टूटा तो गिर पड़े तारे आँख
Moreवे उतनी ही लड़ाकू थीं जितना कि उनका सेनापति वे अपनी ख़ूबसूरती से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थीं अपने जूड़े में उन्होंने सरहुल और ईचा बा की जगह साहस का फूल खोंसा था
Moreपीपल होतीं तुम पीपल, दीदी पिछवाड़े का, तो तुम्हारी खूब घनी-हरी टहनियों में हारिल हम बसेरा लेते हारिल होते हैं हमारी तरह ही घोंसले नहीं बनाते कहीं बसते नहीं कभी दूर पहाड़ों
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