बंटू ने भगाया राक्षस

आज बंटू बहुत ख़ुश था क्योंकि आज वह अपने परिवार के साथ हिल स्टेशन पर पिकनिक मनाने जा रहा था। सुबह बहुत जल्दी वह सब निकल गए। जैसे-जैसे हिल स्टेशन नज़दीक आ रहा

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मुझे तुम्हारा होना प्रिय है

मुझे तुम्हारा होना प्रिय है जितने अपने दौर के नग़्मे रम की बहक भोर की नींद ठिठुरते जाड़े में गर्माते अलाव और ज़बान पर घुल चुके खजूरी गुड़ का स्वाद। एक रोज़

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जब तुम आते हो

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जब तुम आते हो मेरे पास बिना बुलाए और याद दिलाते हो मुझे पुराने कमरों की जहाँ स्मृतियाँ खोई हुई हैं देते हो एक छोटे बच्चे की भाँति अटारी पर रखे बहुत दिनों से

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नहीं लिखा होगा

नहीं लिखा होगा कहीं कि धीरे-धीरे बदल गए पैरों के निशान पगडंडियों में पगडंडियाँ बदल गई रास्तों में और एक दिन रास्ते बदल गए किसी अबूझ पहेली में नहीं लिखा होगा कि

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कोने

कोनों की एक ख़ास जगह बनी रही जीवन में वे देते रहे पनाह चुप, उदासी, दुःख, अनमनेपन आँसू, अवसाद और प्रेम को। यूँ तो कोनों में कई बार रखी गयीं बेमतलब की,

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अमूर्त चाहनाएँ

खंडित आस्थाओं की अपूर्ण प्रतिमाएँ पूर्णता की तलाश में स्थापित कर दी जाती हैं प्राचीन धरोहरों की तरह मंदिरों या समाहरणालय में क्षत विक्षत अंगों के साथ अमूर्त चाहनाएँ भी बोल पड़ती

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दूसरी स्त्री होना पड़ेगा तुम्हें

किसी के प्रेम में पड़ जाने की सही-सही वजह नहीं बता पातीं कभी भी स्त्रियाँ जबकि पुरुषों के पास होते हैं एक सौ एक कारण स्त्रियों के पास अपने प्रेम के पात्र

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कवि का कविता हो जाना

नदी पर कविता लिखने के लिए कवि को नाव होना होता है आग पर लिखने के लिए राख पानी पर पानी बन कर ही लिखा जा सकता है धरती पर लिखने के

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विनोदिनी

मैंने कभी नहीं सोचा था सुबह तक ख़त्म हो जाऊँगा मैं और एक जंगल सी समादृत रहोगी तुम मेरे हृदय के किसी गहरे एकांत में सदा तुम कभी नहीं समझोगी तुम्हारे होने

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घर के अंदर स्त्रियाँ

रातों को जो घरों से बाहर नहीं निकलती हैं वो स्त्रियाँ उगा लेती हैं आकाशगंगा छतों पर। दीवारों पर खिला देती हैं वसंत खिड़की में टांग देती हैं चाँद और उनकी पलंग

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