सारा दिन

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sara din

तुम्हारी आँखें कुछ बोलती रहीं
आज सारा दिन

सूरज मेरे कंधे पर सवार रहा
आज सारा दिन

खूँटी से टँगे कोट में
सारी रात चाय की एक चुस्की ठिठुरती रही
दीवार पर टँगे नक़्शे से
आज सारा दिन

एक छूटी हुई ट्रेन
और तुम्हारा शहर
किसी जंगली बिल्ली की आँख-सा चमकता रहा
आज सारा दिन

स्टेशन पर उद्घोषिका हिमालय वाया संगम दुहराती रही
एक लड़की बारिश में बेख़बर भीगती रही और
मेरे हाथों में अमृता प्रीतम की ‘दो खिड़कियाँ
आज सारा दिन

तितलियाँ मेरी नसों में फड़फड़ाती रहीं
अख़बार के दफ़्तर में
एक गुमशुदा ख़बर चक्कर लगाती रही
आज सारा दिन

कुछ ग़ैरज़रूरी-सा धड़कता रहा
मैं देह वाली स्त्री नकारती रही
ख़ुद को तलाशती रही
आज सारा दिन

 

मृगतृष्णा

मृगतृष्णा हिंदी साहित्य की सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं. आपसे sandhyajourno@gmail.com पे बात की जा सकती है.

मृगतृष्णा हिंदी साहित्य की सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं. आपसे sandhyajourno@gmail.com पे बात की जा सकती है.

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