हम सब तो खड़े हैं मक़तल में

हम सब तो खड़े हैं मक़तल में क्या हमको ख़बर इस बात की है जिस जुल्म को हम सौग़ात कहें सौग़ात वो काली रात की है हम जिसको मसीहा कह बैठे वो

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ये बातें झूठी बातें हैं

ये बातें झूठी बातें हैं, ये लोगों ने फैलाई हैं तुम इंशा जी का नाम न लो, क्या इंशा जी सौदाई हैं? हैं लाखों रोग ज़माने में, क्यों इश्क़ है रुसवा बेचारा हैं

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पढ़ना लिखना सीखो

पढ़ना-लिखना सीखो, ओ मेहनत करने वालों। पढ़ना-लिखना सीखो, ओ भूख से मरने वालों। क ख ग घ को पहचानो, अलिफ़ को पढ़ना सीखो। अ आ इ ई को हथियार, बनाकर लड़ना सीखो।

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नया भारत

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले अब तक कहाँ छिपे थे भाई वो मूरखता, वो घामड़पन जिसमें हमने सदी गँवाई आखिर पहुँची द्वार तुम्हारे अरे बधाई, बहुत बधाई । प्रेत धर्म का नाच

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उम्र पोशी

मैंने पूछा — मुन्ने! तुम क्यूँ अपनी अम्मी जान को बाजी कहते हो मुन्ना बोला बाजी भी तो नानी-जी को आपा आपा कहती हैं इस बाज़ार का जो कोठा है उस की

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वाहिमा

तुम्हारा कहना है तुम मुझे बे-पनाह शिद्दत से चाहते हो तुम्हारी चाहत विसाल की आख़िरी हदों तक मिरे फ़क़त मेरे नाम होगी मुझे यक़ीं है मुझे यक़ीं है मगर क़सम खाने वाले

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एक नज़्म इजाज़तों के लिए

तुम मुझे पहन सकते हो कि मैं ने अपने आप को धुले हुए कपड़े की तरह कई दफ़अ’ निचोड़ा है कई दफ़अ’ सुखाया है तुम मुझे चबा सकते हो कि मैं चूसने

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लेकिन बड़ी देर हो चुकी थी

इस उम्र के बाद उस को देखा! आँखों में सवाल थे हज़ारों होंटों पे मगर वही तबस्सुम! चेहरे पे लिखी हुई उदासी लहजे में मगर बला का ठहराओ आवाज़ में गूँजती जुदाई

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रक़ीब से

जब फैज़ सियालकोट में रह रहे  थे, तो उनके घर के ठीक सामने एक लड़की रहती थी, जिनसे फैज़ को मोहब्बत थी। एक दिन, कॉलेज से लौटने के बाद, फैज़ ने पाया

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