प्रभो!

विमल इन्दु की विशाल किरणें प्रकाश तेरा बता रही हैं अनादि तेरी अनंत माया जगत को लीला दिखा रही हैं प्रसार तेरी दया का कितना ये देखना हो तो देखे सागर तेरी

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पिन बहुत सारे

जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे। इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है ‘पिन-कुशन’ जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया

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चुप्पियाँ

हम थोड़ा और अधिक झुठला सकते थे अपने होने को किंतु हमने उतना होना भर झुठलाया जितने में हम पूर्ण संत न बन सकें पूर्णताओं की इच्छा रह-रह कर उबाले लेती हैं

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प्रतिजैविक

मेरे हाथ टटोलते हुए अपने ही गले को कर लेना चाहते हैं अपनी पकड़ मजबूत कि तुम्हारी ऐनक वाली आंखें चमक उठती हैं और यक-ब-यक दोनों हथेलियां नाभी पर रख याद करती

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मेरी नानी

गाँव में मेरी नानी थी, जो सबसे पहले बसंत की आहट पहचान लेती थी और बिखेर देती थी, अपने इर्दगिर्द  क्यारियों में फूल, फल, सब्जियों के बीज वहाँ धनिए की गंध फैली

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इकलौता डर

जब मैं मरूँगा अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा अपनी क़ब्र को भर दूंगा उन लोगों की तस्‍वीरों से जिनसे मैंने प्‍यार किया मेर नये घर में कोई जगह

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सोते जागते

जागते हुए मैं जिनसे दूर भागता रहता हूँ वे अक्सर मेरी नीन्द में प्रवेश करते हैं एक दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से बचता हूँ लेकिन वह मेरे सपने में प्रकट होता है

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छब्बीस आदमी और एक लड़की

हम छब्बीस थे छब्बीस जीती-जागती मशीनें; गीले तहखानों में बंद, जहां हम क्रेंडल और सुशका बनाने के लिए आटा गूंधते थे. हमारे तहखाने की खिड़की नमी के कारण हरे और कीचड़ भरी

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सौत

जब रजिया के दो-तीन बच्चे होकर मर गए और उम्र ढल चली, तो रामू का प्रेम उससे कुछ कम होने लगा और दूसरे ब्याह की धुन सवार हुई. आए दिन रजिया से

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ईश्वर अगर फूल और वृक्ष है

 (रानीखेत; जुलाई, 1975) कहते हैं, आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किये कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा-सा जी सके। लेकिन

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