दोस्ती का हाथ

गुज़र गए कई मौसम कई रुतें बदलीं उदास तुम भी हो यारो उदास हम भी हैं फ़क़त तुम्हीं को नहीं रंज-ए-चाक-दामानी कि सच कहें तो दरीदा-लिबास हम भी हैं तुम्हारे बाम की

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मैं कैलाश चंद तिवारी

इस वक्त ऋषिकेश से देहरादून जाती सड़क पर हूँ। आस पास जंगल ही जंगल है। और साथ ही तेज हवा और बारिश भी। शहरों में ऐसा देखने को कभी-कभी क्या कभी नहीं

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जहाँ तुम नहीं थे

तुम नहीं थे एक ख़ालीपन था गहरे पग-चिह्न लिए दूर तक रेत थी और कुछ भी नहीं था जहाँ मैं थी वहाँ मैं नहीं थी बची हुई नमी लिए लुप्त होती एक

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पतंगवाला

गली रामनाथ में एक ही पेड़ था। वह बरगद का पेड़ पुरानी मसजिद की टूटी दीवार के बीच से निकला हुआ था। अली की पतंग उसकी टहनियों में फंस गई थी। फटी

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कहाँ हो तुम

अँधेरा बढ़ रहा त्रासद अंधेरा है यह और हम प्रतीक्षारत रोशनी में डूब कर पढ़े जाने के लिए प्रस्तुत प्रतीक्षा को पढ़ने के लिए चाहिए एक जीवन का सन्नाटा सन्नाटे को साधने

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जवान होती लड़की

एक जवान होती लड़की केवल देह होती है सावन चढ़े आकाश के नीचे पूरा भूगोल होती है एक उमड़ी-सी नदी – डगमगाती नाव को भरमाती भँवर होती है दूरागत लोक धुनि की

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प्रभो!

विमल इन्दु की विशाल किरणें प्रकाश तेरा बता रही हैं अनादि तेरी अनंत माया जगत को लीला दिखा रही हैं प्रसार तेरी दया का कितना ये देखना हो तो देखे सागर तेरी

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पिन बहुत सारे

जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे। इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है ‘पिन-कुशन’ जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया

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चुप्पियाँ

हम थोड़ा और अधिक झुठला सकते थे अपने होने को किंतु हमने उतना होना भर झुठलाया जितने में हम पूर्ण संत न बन सकें पूर्णताओं की इच्छा रह-रह कर उबाले लेती हैं

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प्रतिजैविक

मेरे हाथ टटोलते हुए अपने ही गले को कर लेना चाहते हैं अपनी पकड़ मजबूत कि तुम्हारी ऐनक वाली आंखें चमक उठती हैं और यक-ब-यक दोनों हथेलियां नाभी पर रख याद करती

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