कौन है ये गुल मकई? डरती नहीं जो बंदूक़ों से डटी रहती बेख़ौफ़ उनकी धमकियों के सामने ढहा दिए सैकड़ों मदरसे जिन्होंने उजाड़ दी स्वात घाटी तबाह कर दी बेपनाह ख़ूबसूरती और
Moreकविता की दो पंक्तियों के बीच मैं वह जगह हूँ जो सूनी-सूनी-सी दिखती है हमेशा यहीं कवि को अदृश्य परछाईं घूमती रहती है अक्सर मैं कवि के ब्रह्मांड की एक गुप्त आकाशगंगा
Moreकोई हँस रहा है कोई रो रहा है कोई पा रहा है कोई खो रहा है कोई ताक में है किसी को है गफ़लत कोई जागता है कोई सो रहा है कहीं
Moreकितने नामों को छूते हो जिह्वा की नोंक से इस तरह कि मुँह भर जाता हो छालों से कितने नामों को सहलाते हो उँगलियों की थाप से यूँ कि पोरों से छूटता
Moreसबसे शांत स्त्रियाँ अगले जन्म में बिल्लियाँ होंगी वे दबे पाँव आकर टुकुर-टुकुर देखेंगी तुम्हारा उधड़ा जीवन एक नर्म धमक के साथ कूद जाएँगी वे तुम्हारी नींद में ख़लल बनकर जब तुम
Moreनुमाइश के लिए गुलकारियाँ दोनों तरफ़ से हैं लड़ाई की मगर तैयारियाँ दोनों तरफ़ से हैं मुलाक़ातों पे हँसते, बोलते हैं, मुस्कराते हैं तबीयत में मगर बेज़ारियाँ दोनों तरफ़ से हैं खुले
Moreसईउ नी मेरे गल लग रोवो नी मेरी उमरा बीती जाए उमरा दा रंग कच्चा पीला निस दिन फिट्टदा जाए सईउ नी मेरे गल लग्ग रोवो नी मेरी उमर बीती जाए ।
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