कवियों को ढूँढ़ो

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कवियों को ढूँढो, मेरे दोस्त ने कहा वे उन चीज़ों के बारे में बातें नहीं करेंगे जिनके बारे में तुम और मैं बातें करते हैं वे आर्थिक एकीकरण या वित्तीय चकबंदी की

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प्रार्थना

मैंने नहीं देखा ईश्वर को कभी महसूस नहीं किया उसके स्पर्श को नहीं देखा प्रार्थनाओं को पूरा होते बस तुम्हें खिलखिलाते हुए देखती हूँ तो गूंजने लगती है शंखध्वनि सी उभरने लगता

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फिर छिड़ी रात बात फूलों की

फिर छिड़ी रात बात फूलों की रात है या बारात फूलों की फूल के हार, फूल के गजरे शाम फूलों की रात फूलों की आपका साथ, साथ फूलों का आपकी बात, बात

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आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं

एक आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं इधर से चीखने, रोने, विलाप करने की, उधर से धमकियाँ, और ग़ालियाँ रंजिश से भरी वहाँ से लूट लो, पकड़ो इसे, अब छोड़ना मत

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महाब्राह्मण

वहाँ कोई नहीं है धिकते हुए लोहे की तरह लगती हैं अपनी ही सांसें खाँसते हुए अपाढ़ है उठना-बैठना आवाज़ जो रहती थी समय-असमय में तत्पर वह भी काया के भीतर कहीं

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यूटोपिया

उसने अपनी जेब में इतने अहंकार से हाथ डाला कि उस पल मुझे लगा काश ! किसी के पास जेब न होती तो कितना अच्छा होता आख़िर क्यों हो किसी के पास

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कल कहाँ जाओगी

सुबह की पहली किरण की तरह वो मेरे आंगन में छन्न से उतरी थी। उतरते ही टूटकर बिखर गई थी। और उसके बिखरते ही सारे आंगन में पीली-सी चमकदार रोशनी कोने-कोने तक

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राहुल तोमर की कविताएँ

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1) किक्की के लिए तुम्हें बढ़ते हुए देखने से ज़्यादा सुखद मेरे लिए और कुछ नहीं परन्तु तुम ऐसे वक़्त में बड़ी हो रही हो मेरी बच्ची जब मानवता की हांफनी छूटी

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शास्त्रज्ञ मूर्ख (हितोपदेश)

किसी नगर में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें खासा मेल-जोल था। बचपन में ही उनके मन में आया कि कहीं चलकर पढ़ाई की जाए। अगले दिन वे पढ़ने के लिए कन्नौज नगर

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