परियों की बातें

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मैं अपने दोस्त के पास बैठा था। उस वक़्त मेरे दिमाग़ में सुक़्रात का एक ख़याल चक्कर लगा रहा था— क़ुदरत ने हमें दो कान दिये हैं और दो आंखें मगर ज़बान सिर्फ़ एक ताकि हम बहुत ज़्यादा सुनें और देखें और बोलें कम, बहुत कम!

मैं ने कहा “आज कोई अफ़्साना सुनाओ, दोस्त”!

वो बोला। तो आओ, आज मैं तुम्हें एक अज़ीमुश्शान अफ़्साना सुनाऊं:

दो भेड़ें एक जौहड़ के किनारे पानी पी रही थीं।

पानी पीते हुये छोटी भेड़ ने कहा:

मैं अक्सर सुनती हूं उस गाँव के लोग सुंदर, मन मोहनी परियों की बातें किया करते हैं!

बड़ी भेड़ पानी पीती हुई एक लमहा के लिये रुक गई और आहिस्ता से बोली:

“चुप चुप बहन! ये लोग दरअस्ल हमारी ही बातें करते हैं…”

देवेन्द्र सत्यार्थी

देवेन्द्र सत्यार्थी (28 मई 1908 - १२ फरवरी, २००३) हिंदी, उर्दू और पंजाबी भाषाओं के विद्वान तथा साहित्यकार थे। उनका मूल नाम देवेन्द्र बत्ता था। श्री सत्यार्थी लोकगीत अध्ययन के प्रणेताओं मे से रहे हैं। उन्होंने देश के कोने-कोने की यात्रा कर वहां के लोकजीवन, गीतों और परंपराओं को आत्मसात किया और उन्हें पुस्तकों और वार्ताओं में संग्रहीत कर दिया जिसके लिये वे 'लोकयात्री' के रूप में जाने जाते हैं।

देवेन्द्र सत्यार्थी (28 मई 1908 - १२ फरवरी, २००३) हिंदी, उर्दू और पंजाबी भाषाओं के विद्वान तथा साहित्यकार थे। उनका मूल नाम देवेन्द्र बत्ता था। श्री सत्यार्थी लोकगीत अध्ययन के प्रणेताओं मे से रहे हैं। उन्होंने देश के कोने-कोने की यात्रा कर वहां के लोकजीवन, गीतों और परंपराओं को आत्मसात किया और उन्हें पुस्तकों और वार्ताओं में संग्रहीत कर दिया जिसके लिये वे 'लोकयात्री' के रूप में जाने जाते हैं।

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