स्त्री

स्त्री के अंदर अगर झाँक सको तो देखना वहाँ असंख्य कविताएँ आज भी दम तोड़ रही हैं चूल्हे की भट्टी परिवार की जिम्मेदारी बच्चों के प्रति ख़ुद का समर्पण इन सबों की

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छूट गयी स्त्रियाँ

वे छूट गयी स्त्रियाँ हैं जिनकी देह से पोंछा जा रहा है योद्धाओं का पसीना एक सभ्यता के ख़ात्मे के बाद उनकी रक्तरंजित कोख से मनवांछित नस्ल उगाई जाएगी वे छूट गयी

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नूर मियाँ

आज तो चाहे कोई विक्टोरिया छाप काजल लगाये या साध्वी ऋतंभरा छाप अंजन लेकिन असली गाय के घी का सुरमा तो नूर मियाँ ही बनाते थे कम से कम मेरी दादी का

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वो आएगी हर ओर से

वो आएगी हर ओर से और तुम रोक न सकोगे उसका आना तय था इतिहास में कुलबुलाहट थी तुमने हर ग्रंथ में ख़ुद तय किया था कि वो उतरेगी सड़कों पर तुम्हारे

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इक पगली लड़की के बिन

अमावस की काली रातों में, दिल का दरवाजा खुलता है जब दर्द की प्याली रातों में, गम आंसू के संग घुलता है जब पिछवाड़े के कमरें में, हम निपट अकेले होते हैं

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मेकअप रूम में कवि

(एक) ————- मेक-अप रूम में कवि ने छब्बीस बार गुनगुनाया प्रेम और तेरह बार दोहराया प्रतीक्षा पूरे ध्यान से साढ़े छह बार फुसफुसाया प्रतिरोध और अन्त में सवा तीन बार याद किया

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मीनाक्षी मिश्र की कविताएँ

1. रियायत जीवन में मिली इतनी रियायतों के बावजूद न जुगनुओं से की दोस्ती न रूमानियत के पाठ पढ़े जाग्रत न कर पाई खुद में कोई उदात्त भाव ही वंचित रही मैं

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अर्पण जमवाल की कविताएँ

1.  जीवन इतना दुरूह रहा कि दुखों की तस्बीह पर साधा मैंने अपना असाध्य जीवन और उनके अतिशय पर जाना कि, मोक्ष कुछ और नहीं, सुख और दुख से परे की अनुभूति

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नफ़रत

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देखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है हमारी सदी की नफ़रत, किस आसानी से चूर-चूर कर देती है बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को! किस फुर्ती से झपटकर हमें दबोच लेती है! यह

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