कोने

कोनों की एक ख़ास जगह बनी रही जीवन में वे देते रहे पनाह चुप, उदासी, दुःख, अनमनेपन आँसू, अवसाद और प्रेम को। यूँ तो कोनों में कई बार रखी गयीं बेमतलब की,

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अमूर्त चाहनाएँ

खंडित आस्थाओं की अपूर्ण प्रतिमाएँ पूर्णता की तलाश में स्थापित कर दी जाती हैं प्राचीन धरोहरों की तरह मंदिरों या समाहरणालय में क्षत विक्षत अंगों के साथ अमूर्त चाहनाएँ भी बोल पड़ती

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दूसरी स्त्री होना पड़ेगा तुम्हें

किसी के प्रेम में पड़ जाने की सही-सही वजह नहीं बता पातीं कभी भी स्त्रियाँ जबकि पुरुषों के पास होते हैं एक सौ एक कारण स्त्रियों के पास अपने प्रेम के पात्र

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कवि का कविता हो जाना

नदी पर कविता लिखने के लिए कवि को नाव होना होता है आग पर लिखने के लिए राख पानी पर पानी बन कर ही लिखा जा सकता है धरती पर लिखने के

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विनोदिनी

मैंने कभी नहीं सोचा था सुबह तक ख़त्म हो जाऊँगा मैं और एक जंगल सी समादृत रहोगी तुम मेरे हृदय के किसी गहरे एकांत में सदा तुम कभी नहीं समझोगी तुम्हारे होने

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घर के अंदर स्त्रियाँ

रातों को जो घरों से बाहर नहीं निकलती हैं वो स्त्रियाँ उगा लेती हैं आकाशगंगा छतों पर। दीवारों पर खिला देती हैं वसंत खिड़की में टांग देती हैं चाँद और उनकी पलंग

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बोलने में कम से कम बोलूँ

बोलने में कम से कम बोलूँ कभी बोलूँ, अधिकतम न बोलूँ इतना कम कि किसी दिन एक बात बार-बार बोलूँ जैसे कोयल की बार-बार की कूक फिर चुप। मेरे अधिकतम चुप को

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उदास औरत

(एक) जब तय था कि समझ लिया जाता मोह और प्रेम कोई भावना नहीं होती रात को नींद देर से आने की हज़ार जायज़ वजहें हो सकती हैं ज़रा सा रद्दोबदल होता

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क्षीण ध्वनि

कौन दुःख के इन सदाबहार फूलों को खाद-पानी देता है! मेरे भीतर एक क्षीण ध्वनि कराहती है “उसकी याद ही तो” मेरे चित्त के अरण्य में मेरी ही आत्मा का कोलाहल किसका

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बेजगह

“अपनी जगह से गिर कर कहीं के नहीं रहते केश, औरतें और नाख़ून” – अन्वय करते थे किसी श्लोक को ऐसे हमारे संस्कृत टीचर। और मारे डर के जम जाती थीं हम

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