आज तो चाहे कोई विक्टोरिया छाप काजल लगाये या साध्वी ऋतंभरा छाप अंजन लेकिन असली गाय के घी का सुरमा तो नूर मियाँ ही बनाते थे कम से कम मेरी दादी का
Moreवो आएगी हर ओर से और तुम रोक न सकोगे उसका आना तय था इतिहास में कुलबुलाहट थी तुमने हर ग्रंथ में ख़ुद तय किया था कि वो उतरेगी सड़कों पर तुम्हारे
Moreमुमकिन है एक औरत, एक आदमी के लेखन से प्रभावित हो कर उस से मिले, और जल्द ही उसे लिखने के दूसरे तरीक़े सुझाने लगे लेकिन गर वह आदमी उस औरत से
Moreनदी के किनारे बैठकर दोनों ने अंतिम चिट्ठी लिखी- “यह दुनिया क्रूर है। प्रेमियों को मिलने नहीं देती। हम इसे छोड़कर उस लोक जा रहे हैं, जहां प्रेम के मार्ग में कोई
Moreअमावस की काली रातों में, दिल का दरवाजा खुलता है जब दर्द की प्याली रातों में, गम आंसू के संग घुलता है जब पिछवाड़े के कमरें में, हम निपट अकेले होते हैं
More(एक) ————- मेक-अप रूम में कवि ने छब्बीस बार गुनगुनाया प्रेम और तेरह बार दोहराया प्रतीक्षा पूरे ध्यान से साढ़े छह बार फुसफुसाया प्रतिरोध और अन्त में सवा तीन बार याद किया
More1. रियायत जीवन में मिली इतनी रियायतों के बावजूद न जुगनुओं से की दोस्ती न रूमानियत के पाठ पढ़े जाग्रत न कर पाई खुद में कोई उदात्त भाव ही वंचित रही मैं
Moreमेरे एक मुलाकाती हैं। वे कान्यकुब्ज हैं। एक दिन वे चिंता से बोले – अब हम कान्यकुब्जों का क्या होगा? मैंने कहा – आप लोगों को क्या डर है? आप लोग जगह-जगह
More1. जीवन इतना दुरूह रहा कि दुखों की तस्बीह पर साधा मैंने अपना असाध्य जीवन और उनके अतिशय पर जाना कि, मोक्ष कुछ और नहीं, सुख और दुख से परे की अनुभूति
Moreदेखो, तो अब भी कितनी चुस्त-दुरुस्त और पुरअसर है हमारी सदी की नफ़रत, किस आसानी से चूर-चूर कर देती है बड़ी-से-बड़ी रुकावटों को! किस फुर्ती से झपटकर हमें दबोच लेती है! यह
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