न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है दिया जल रहा है हवा चल रही है सुकूँ ही सुकूँ है ख़ुशी ही ख़ुशी है तिरा ग़म सलामत मुझे क्या कमी है
Moreहर ईंट सोचती है कि दीवार उस से है हर सर यही समझता है दस्तार उस से है है आग पेट की तभी छम-छम है रक़्स में पायल समझती है कि ये
Moreमैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ तख़्त के बा’द तिरे पाँव में देखा गया हूँ दफ़्न होती हुई झीलों में ठिकाने हैं मिरे ख़ुश्क होते हुए दरियाओं में देखा गया हूँ मस्जिदों
Moreहम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह हम ने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह ख़ुद-ब-ख़ुद नींद सी आँखों में घुली जाती है महकी महकी है शब-ए-ग़म तिरे बालों
More(ये कविताएँ पहाड़ के दूर दराज क्षेत्रों के ऐसे लोकगीतों से प्रेरित हैं जिन्हें लोक कविताएँ कहना ज्यादा सही होगा पर ये उनके अनुवाद नहीं हैं।) 1. तुम्हें कहीं खोजना असंभव था
Moreहम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर अपने अपने घर पहुँचना चाहते हम सब ट्रेनें बदलने की झंझटों से बचना चाहते हम सब चाहते एक चरम यात्रा और एक परम धाम हम
Moreकाली मिट्टी काले घर दिनभर बैठे-ठाले घर काली नदिया काला धन सूख रहे हैं सारे बन काला सूरज काले हाथ झुके हुए हैं सारे माथ काली बहसें काला न्याय खाली मेज पी
Moreहम जी रहे हैं जान! तुम्हारे बग़ैर भी हर दिन गुज़र रहा है गुज़ारे बग़ैर भी सबके लिए किनारे पे होता नहीं कोई कुछ लोग डूबते हैं पुकारे बग़ैर भी जीते बग़ैर
More(एक ) हौव्वा नहीं होतीं घर से भागी हुई लड़कियाँ पहनतीं हैं पूरे कपड़े संभाल के रखती हैं ख़ुद को एक करवट में गुजारी रात के बाद सुबह अँधेरे पिता को प्रणाम
Moreयह लड़की जब उदास होगी तो क्या सोचेगी? आज नहीं कल नहीं बरसों बाद यह लड़की जब उदास होगी तो क्या सोचेगी भला? शायद वह सोचेगी उस प्रेम के बारे में जो
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