मैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ

मैं खुजूरों-भरे सहराओं में देखा गया हूँ तख़्त के बा’द तिरे पाँव में देखा गया हूँ दफ़्न होती हुई झीलों में ठिकाने हैं मिरे ख़ुश्क होते हुए दरियाओं में देखा गया हूँ मस्जिदों

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पुनर्राचनाएँ

(ये कविताएँ पहाड़ के दूर दराज क्षेत्रों के ऐसे लोकगीतों से प्रेरित हैं जिन्हें लोक कविताएँ कहना ज्यादा सही होगा पर ये उनके अनुवाद नहीं हैं।) 1. तुम्हें कहीं खोजना असंभव था

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घर पहुँचना

हम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर अपने अपने घर पहुँचना चाहते हम सब ट्रेनें बदलने की झंझटों से बचना चाहते हम सब चाहते एक चरम यात्रा और एक परम धाम हम

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काली मिट्टी

काली मिट्टी काले घर दिनभर बैठे-ठाले घर काली नदिया काला धन सूख रहे हैं सारे बन काला सूरज काले हाथ झुके हुए हैं सारे माथ काली बहसें काला न्याय खाली मेज पी

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घर से भागी हुई लड़कियाँ

(एक ) हौव्वा नहीं होतीं घर से भागी हुई लड़कियाँ पहनतीं हैं पूरे कपड़े संभाल के रखती हैं ख़ुद को एक करवट में गुजारी रात के बाद सुबह अँधेरे पिता को प्रणाम

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यह लड़की जब उदास होगी

यह लड़की जब उदास होगी तो क्या सोचेगी? आज नहीं कल नहीं बरसों बाद यह लड़की जब उदास होगी तो क्या सोचेगी भला? शायद वह सोचेगी उस प्रेम के बारे में जो

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