मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो
तुम्हारी आवाज़ की उँगली पकड़े मैं करती हूँ यात्रा अधैर्य से धैर्य की आक्रोश से प्रेम की उद्वेग से शांति की विषम से सम की तुम्हारी आवाज़ के आरोह-अवरोह में समा जाते
More1. प्रेम में डूबी हुई औरतें कई बार लांघती हैं घर की चौखट को अपनी चिट्ठियों से अपने अधूरे प्रेम से अनसुने संवाद से अनकहे वायदों से उन गाए हुए गीतों में
More1. मुझसे यह कहना कि हर मर्द के इरादे बुरे नहीं होते कुछ नहीं करता मुझे आश्वस्त करने के लिए तुमसे कुछ दूर चले जाने के बाद भी कुछ नहीं बदला होगा
Moreकितना प्रामाणिक था उसका दुःख लड़की को दान में देते वक्त जैसे वही उसकी अंतिम पूँजी हो लड़की अभी सयानी नहीं थी अभी इतनी भोली सरल थी कि उसे सुख का आभास
More(ये कविताएँ पहाड़ के दूर दराज क्षेत्रों के ऐसे लोकगीतों से प्रेरित हैं जिन्हें लोक कविताएँ कहना ज्यादा सही होगा पर ये उनके अनुवाद नहीं हैं।) 1. तुम्हें कहीं खोजना असंभव था
Moreहम सब एक सीधी ट्रेन पकड़ कर अपने अपने घर पहुँचना चाहते हम सब ट्रेनें बदलने की झंझटों से बचना चाहते हम सब चाहते एक चरम यात्रा और एक परम धाम हम
Moreकाली मिट्टी काले घर दिनभर बैठे-ठाले घर काली नदिया काला धन सूख रहे हैं सारे बन काला सूरज काले हाथ झुके हुए हैं सारे माथ काली बहसें काला न्याय खाली मेज पी
More(एक ) हौव्वा नहीं होतीं घर से भागी हुई लड़कियाँ पहनतीं हैं पूरे कपड़े संभाल के रखती हैं ख़ुद को एक करवट में गुजारी रात के बाद सुबह अँधेरे पिता को प्रणाम
Moreयह लड़की जब उदास होगी तो क्या सोचेगी? आज नहीं कल नहीं बरसों बाद यह लड़की जब उदास होगी तो क्या सोचेगी भला? शायद वह सोचेगी उस प्रेम के बारे में जो
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