तुम लौटना

तुम लौटना यह साल वापसी का है बिछड़े अय्यार प्रेम के पुनर्वास का मुझे उम्मीद है, तुम आओगे और सब ठीक हो जाएगा तुम्हारे छूने भर से दारुणता समाप्त हो जाएगी जर्जर

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उलगुलान की औरतें

वे उतनी ही लड़ाकू थीं जितना कि उनका सेनापति वे अपनी ख़ूबसूरती से कहीं ज़्यादा ख़तरनाक थीं अपने जूड़े में उन्होंने सरहुल और ईचा बा की जगह साहस का फूल खोंसा था

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नींव की ईंट हो तुम दीदी

पीपल होतीं तुम पीपल, दीदी पिछवाड़े का, तो तुम्हारी खूब घनी-हरी टहनियों में हारिल हम बसेरा लेते हारिल होते हैं हमारी तरह ही घोंसले नहीं बनाते कहीं बसते नहीं कभी दूर पहाड़ों

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कलगी बाजरे की

हरी बिछली घास। दोलती कलगी छरहरे बाजरे की। अगर मैं तुम को ललाती साँझ के नभ की अकेली तारिका अब नहीं कहता, या शरद के भोर की नीहार – न्हायी कुँई, टटकी

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ऑनलाइन युग में युवा कवि

1. मुश्किल इस युग में जितना आसान है कवि बनना उससे भी ज़्यादा सहूलियत भरा किनारे कर दिया जाना युद्ध के बाद भूखी भीड़ टूट पड़ी है आसमान से बरसती सहायता पर

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चुनाव

बहुत सारे सच और बहुत सारे झूठ सुनने के बाद इतना तय हुआ दुनिया दोनों के साथ चलेगीचुनाव जिसे आपत्ति है वह दर्ज़ करवाए मेरा अपना कुछ नहीं था मुझे तो बस

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महामारी के दिनों में

जिल्द की सबसे छोटी कहानी कभी यह शिकायत नहीं करती कि लम्बी कहानी ने उसका हक़ मार लिया एक छोटी ज़िन्दगी का सत्व सौ साल जीने वाला कोई चुरा नहीं सकता। आज

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प्रेम

उन रास्तों से मैं कभी नहीं आना चाहता था जहाँ लिखा था कि प्रेम यही उत्पन्न हुआ वहाँ तुम्हारी तासीर थी और एक अनकही गन्ध जो बांधे रही समय दर समय कितनी

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नाचती हुई स्त्री

नाचती हुई स्त्री घूमती हुई पृथ्वी है जिसके पैरों में बँधे हैं दिन और रात जिसके हाव-भाव और मुद्राओं के साथ बदलते हैं मौसम पृथ्वी का केंद्रबिंदु है बैली डांस करती स्त्री की

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एक कवि कहता है

नामुमकिन है यह बतलाना कि एक कवि कविता के भीतर कितना और कितना रहता है एक कवि है जिसका चेहरा-मोहरा, ढाल-चाल और बातों का ढब भी उसकी कविता से इतना ज्यादा मिलता-जुलता

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