मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो
एक टूटते हुए घर की चीखें दूर-दूर तक सुनी जाती हैं कान दिए लोग सुनते हैं चेहरे पर कोफ्त लपेटे नींद की गोलियाँ निगलने पर भी वह टूटता हुआ घर सारी-सारी रात
Moreयों तो मेरे लेखन की शुरुआत ही डायरी लेखन से हुई। पर इधर लगभग तीन साल से दिन के चौबीस घंटे मेरा अनवरत डायरी लेखन या कहें, अपने से संवाद चलता रहता है
Moreचाहे नक्काशीदार एंटीक दरवाज़ा हो या लकड़ी के चिरे हुए फट्टों से बना उस पर खूबसूरत हैंडल जड़ा हो या लोहे का कुंडा वह दरवाज़ा ऐसे घर का हो जहाँ माँ बाप
Moreहाथों के दिन आएँगे। कब आएँगे, यह तो कोई नहीं बताता। करने वाले जहाँ कहीं भी देखा अब तक डरने वाले मिलते हैं। सुख की रोटी कब खाएँगे, सुख से कब सोएँगे,
Moreयदि तुम्हें, धकेलकर गांव से बाहर कर दिया जाए पानी तक न लेने दिया जाए कुएँ से दुत्कारा फटकारा जाए चिल-चिलाती दोपहर में कहा जाए तोड़ने को पत्थर काम के बदले दिया
Moreइश्क़ में जाँ से गुज़रते हैं गुज़रने वाले मौत की राह नहीं देखते मरने वाले आख़िरी वक़्त भी पूरा न किया वादा-ए-वस्ल आप आते ही रहे मर गये मरने वाले उठ्ठे और
Moreतुम जलाकर दिये, मुँह छुपाते रहे, जगमगाती रही कल्पना रात जाती रही, भोर आती रही, मुसकुराती रही कामना चाँद घूँघट घटा का उठाता रहा द्वार घर का पवन खटखटाता रहा पास आते
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