आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं

एक आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं इधर से चीखने, रोने, विलाप करने की, उधर से धमकियाँ, और ग़ालियाँ रंजिश से भरी वहाँ से लूट लो, पकड़ो इसे, अब छोड़ना मत

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महाब्राह्मण

वहाँ कोई नहीं है धिकते हुए लोहे की तरह लगती हैं अपनी ही सांसें खाँसते हुए अपाढ़ है उठना-बैठना आवाज़ जो रहती थी समय-असमय में तत्पर वह भी काया के भीतर कहीं

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यूटोपिया

उसने अपनी जेब में इतने अहंकार से हाथ डाला कि उस पल मुझे लगा काश ! किसी के पास जेब न होती तो कितना अच्छा होता आख़िर क्यों हो किसी के पास

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कल कहाँ जाओगी

सुबह की पहली किरण की तरह वो मेरे आंगन में छन्न से उतरी थी। उतरते ही टूटकर बिखर गई थी। और उसके बिखरते ही सारे आंगन में पीली-सी चमकदार रोशनी कोने-कोने तक

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राहुल तोमर की कविताएँ

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1) किक्की के लिए तुम्हें बढ़ते हुए देखने से ज़्यादा सुखद मेरे लिए और कुछ नहीं परन्तु तुम ऐसे वक़्त में बड़ी हो रही हो मेरी बच्ची जब मानवता की हांफनी छूटी

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शास्त्रज्ञ मूर्ख (हितोपदेश)

किसी नगर में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें खासा मेल-जोल था। बचपन में ही उनके मन में आया कि कहीं चलकर पढ़ाई की जाए। अगले दिन वे पढ़ने के लिए कन्नौज नगर

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एक निर्णायक पत्र

उस कस्बानुमा शहर के मास्टर कुमार विनय को आजकल क्यों लग रहा है कि उसके साथ दूसरी बार धोखा किया जा रहा है? पहली बार जब हुआ तो प्रसंग दूसरा था और

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नकली कवियों की वसुंधरा

धन्य यह वसुंधरा! मुख में इतनी सारी नदियों का झाग, केशों में अंधकार! एक अंतहीन प्रसव-पीड़ा में पड़ी हुई पल-पल मनुष्य उगल रही है, नगर फेंक रही है, बिलों से मनुष्य निकल

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पूँजीवादी समाज के प्रति

इतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद जितना ढोंग, जितना भोग

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