मैंने पहली बार महसूस किया है कि नंगापन अन्धा होने के खिलाफ़ एक सख्त कार्यवाही है उस औरत की बगल में लेटकर मुझे लगा कि नफ़रत और मोमबत्तियाँ जहाँ बेकार साबित हो
ये जो ज़िंदगी है ये कौन है ये जो बेबसी है ये कौन है ये तुम्हारे लम्स को क्या हुआ ये जो बे-हिसी है ये कौन है वो जो मेरे जैसा था
Moreएक आजकल कानों में आवाज़ें बहुत आती हैं इधर से चीखने, रोने, विलाप करने की, उधर से धमकियाँ, और ग़ालियाँ रंजिश से भरी वहाँ से लूट लो, पकड़ो इसे, अब छोड़ना मत
Moreवहाँ कोई नहीं है धिकते हुए लोहे की तरह लगती हैं अपनी ही सांसें खाँसते हुए अपाढ़ है उठना-बैठना आवाज़ जो रहती थी समय-असमय में तत्पर वह भी काया के भीतर कहीं
Moreसुबह की पहली किरण की तरह वो मेरे आंगन में छन्न से उतरी थी। उतरते ही टूटकर बिखर गई थी। और उसके बिखरते ही सारे आंगन में पीली-सी चमकदार रोशनी कोने-कोने तक
More1) किक्की के लिए तुम्हें बढ़ते हुए देखने से ज़्यादा सुखद मेरे लिए और कुछ नहीं परन्तु तुम ऐसे वक़्त में बड़ी हो रही हो मेरी बच्ची जब मानवता की हांफनी छूटी
Moreकिसी नगर में चार ब्राह्मण रहते थे। उनमें खासा मेल-जोल था। बचपन में ही उनके मन में आया कि कहीं चलकर पढ़ाई की जाए। अगले दिन वे पढ़ने के लिए कन्नौज नगर
Moreउस कस्बानुमा शहर के मास्टर कुमार विनय को आजकल क्यों लग रहा है कि उसके साथ दूसरी बार धोखा किया जा रहा है? पहली बार जब हुआ तो प्रसंग दूसरा था और
Moreधन्य यह वसुंधरा! मुख में इतनी सारी नदियों का झाग, केशों में अंधकार! एक अंतहीन प्रसव-पीड़ा में पड़ी हुई पल-पल मनुष्य उगल रही है, नगर फेंक रही है, बिलों से मनुष्य निकल
Moreइतने प्राण, इतने हाथ, इतनी बुद्धि इतना ज्ञान, संस्कृति और अंतःशुद्धि इतना दिव्य, इतना भव्य, इतनी शक्ति यह सौंदर्य, वह वैचित्र्य, ईश्वर-भक्ति इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद जितना ढोंग, जितना भोग
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