उधर के चोर

उधर के चोर भी अजीब हैं लूट और डकैती के अजीबो-गरीब किस्से – कहते हैं ट्रेन-डकैती सात बजते-बजते संपन्न हो जाती है क्योंकि डकैतों को जल्दी सोने की आदत है और चूँकि

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मेरे स्वप्न

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएँगे इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएँगे हौले-हौले पाँव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएँगे थोड़ी आँच

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न जाने हुई बात क्या

न जाने हुई बात क्या मन इधर कुछ बदल-सा गया है मुझे अब बहुत पूछने तुम लगी हो उधर नींद थी इन दिनों तुम जगी हो यही बात होगी अगर कुछ न

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कविताएँ : रुपेश चौरसिया

1. स्मृतियों के अवशेष अवचेतन में सोए रहते हैं पुरानी डायरी की सोंधी सुगंध से एकाएक उठ बैठती हैं अल्हड़ जवान स्मृतियां और ठहाके मारकर हंसती हैं जैसे एक बच्चा खिलखिला रहा

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कविताएँ : आलम आज़ाद

1. प्रेमिकाएं मैं किसी से कैसे प्रेम करूँ? लगभग मेरी सभी प्रेमिकाओं ने मुझे निराश किया है अब तक सूखे मौसम की तरह! आकाश भर प्रेम के बदले दुनिया भर की टूटी

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कविताएँ : आसित आदित्य

1. तुम्हें सौगंध है, मेरे क़ातिल प्रेम करने के लिए नादान होना उतना ही है आवश्यक जितना कि जीवित रहने के लिए उम्मीद का होना। तुम्हारे खंजर से टपकते मेरे लहू की

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