नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
अँधेरा बढ़ रहा त्रासद अंधेरा है यह और हम प्रतीक्षारत रोशनी में डूब कर पढ़े जाने के लिए प्रस्तुत प्रतीक्षा को पढ़ने के लिए चाहिए एक जीवन का सन्नाटा सन्नाटे को साधने
Moreएक जवान होती लड़की केवल देह होती है सावन चढ़े आकाश के नीचे पूरा भूगोल होती है एक उमड़ी-सी नदी – डगमगाती नाव को भरमाती भँवर होती है दूरागत लोक धुनि की
Moreजिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे। इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है ‘पिन-कुशन’ जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया
Moreमेरे हाथ टटोलते हुए अपने ही गले को कर लेना चाहते हैं अपनी पकड़ मजबूत कि तुम्हारी ऐनक वाली आंखें चमक उठती हैं और यक-ब-यक दोनों हथेलियां नाभी पर रख याद करती
Moreजागते हुए मैं जिनसे दूर भागता रहता हूँ वे अक्सर मेरी नीन्द में प्रवेश करते हैं एक दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से बचता हूँ लेकिन वह मेरे सपने में प्रकट होता है
Moreकाली मिट्टी काले घर दिनभर बैठे-ठाले घर काली नदिया काला धन सूख रहे हैं सारे बन काला सूरज काले हाथ झुके हुए हैं सारे माथ काली बहसें काला न्याय खाली मेज पी
Moreन तुम सो रही हो, न मैं सो रहा हूँ, मगर यामिनी बीच में ढल रही है। दिखाई पड़े पूर्व में जो सितारे, वही आ गए ठीक ऊपर हमारे, क्षितिज पश्चिमी है
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