कहाँ हो तुम

अँधेरा बढ़ रहा त्रासद अंधेरा है यह और हम प्रतीक्षारत रोशनी में डूब कर पढ़े जाने के लिए प्रस्तुत प्रतीक्षा को पढ़ने के लिए चाहिए एक जीवन का सन्नाटा सन्नाटे को साधने

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जवान होती लड़की

एक जवान होती लड़की केवल देह होती है सावन चढ़े आकाश के नीचे पूरा भूगोल होती है एक उमड़ी-सी नदी – डगमगाती नाव को भरमाती भँवर होती है दूरागत लोक धुनि की

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प्रभो!

विमल इन्दु की विशाल किरणें प्रकाश तेरा बता रही हैं अनादि तेरी अनंत माया जगत को लीला दिखा रही हैं प्रसार तेरी दया का कितना ये देखना हो तो देखे सागर तेरी

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पिन बहुत सारे

जिंदगी का अर्थ मरना हो गया है और जीने के लिये हैं दिन बहुत सारे। इस समय की मेज़ पर रक्खी हुई जिंदगी है ‘पिन-कुशन’ जैसी दोस्ती का अर्थ चुभना हो गया

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चुप्पियाँ

हम थोड़ा और अधिक झुठला सकते थे अपने होने को किंतु हमने उतना होना भर झुठलाया जितने में हम पूर्ण संत न बन सकें पूर्णताओं की इच्छा रह-रह कर उबाले लेती हैं

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प्रतिजैविक

मेरे हाथ टटोलते हुए अपने ही गले को कर लेना चाहते हैं अपनी पकड़ मजबूत कि तुम्हारी ऐनक वाली आंखें चमक उठती हैं और यक-ब-यक दोनों हथेलियां नाभी पर रख याद करती

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मेरी नानी

गाँव में मेरी नानी थी, जो सबसे पहले बसंत की आहट पहचान लेती थी और बिखेर देती थी, अपने इर्दगिर्द  क्यारियों में फूल, फल, सब्जियों के बीज वहाँ धनिए की गंध फैली

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सोते जागते

जागते हुए मैं जिनसे दूर भागता रहता हूँ वे अक्सर मेरी नीन्द में प्रवेश करते हैं एक दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से बचता हूँ लेकिन वह मेरे सपने में प्रकट होता है

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काली मिट्टी

काली मिट्टी काले घर दिनभर बैठे-ठाले घर काली नदिया काला धन सूख रहे हैं सारे बन काला सूरज काले हाथ झुके हुए हैं सारे माथ काली बहसें काला न्याय खाली मेज पी

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