कितना अच्छा होता है

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एक-दूसरे को बिना जाने
पास-पास होना
और उस संगीत को सुनना
जो धमनियों में बजता है,
उन रंगों में नहा जाना
जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं।

शब्दों की खोज शुरु होते ही
हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं
और उनके पकड़ में आते ही
एक-दूसरे के हाथों से
मछली की तरह फिसल जाते हैं।

हर जानकारी में बहुत गहरे
ऊब का एक पतला धागा छिपा होता है,
कुछ भी ठीक से जान लेना
ख़ुद से दुश्मनी ठान लेना है।

कितना अच्छा होता है
एक-दूसरे के पास बैठ ख़ुद को टटोलना,
और अपने ही भीतर
दूसरे को पा लेना।

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना (15/09/1927 – 24/09/1983) हिंदी के प्रसिद्ध लेखक, कवि, स्तंभकार और नाटककार के रूप में मान्य रहे. वह पहली बार प्रकाशित ‘तार सप्तक’ के सात कवियों में से एक थे जो प्रयोगवाद युग की शुरुआत करता है और कालांतर में ‘नयी कविता आन्दोलन’ बनता है.

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