प्रतिजैविक

मेरे हाथ टटोलते हुए अपने ही गले को कर लेना चाहते हैं अपनी पकड़ मजबूत कि तुम्हारी ऐनक वाली आंखें चमक उठती हैं और यक-ब-यक दोनों हथेलियां नाभी पर रख याद करती

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मेरी नानी

गाँव में मेरी नानी थी, जो सबसे पहले बसंत की आहट पहचान लेती थी और बिखेर देती थी, अपने इर्दगिर्द  क्यारियों में फूल, फल, सब्जियों के बीज वहाँ धनिए की गंध फैली

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इकलौता डर

जब मैं मरूँगा अपने साथ अपनी सारी प्रिय किताबों को ले जाऊंगा अपनी क़ब्र को भर दूंगा उन लोगों की तस्‍वीरों से जिनसे मैंने प्‍यार किया मेर नये घर में कोई जगह

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सोते जागते

जागते हुए मैं जिनसे दूर भागता रहता हूँ वे अक्सर मेरी नीन्द में प्रवेश करते हैं एक दुर्गम पहाड़ पर चढ़ने से बचता हूँ लेकिन वह मेरे सपने में प्रकट होता है

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यह ज़्यादा बहुत ज़्यादा है

कुछ लोगों के पास हर चीज़ ज़रूरत से बहुत ज़्यादा है वे लोग ही जगह-जगह दिखते हैं बार-बार उनमें बार-बार दिखने की सामर्थ्य ज़्यादा है वे लोग दिन-रात बने रहते हैं अख़बारों

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जहाँ सुख है

जहाँ सुख है वहीं हम चटक कर टूट जाते हैं बारम्बार जहाँ दुख है वहाँ पर एक सुलगन पिघला कर हमें फिर जोड़ देती है।

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मैं सोचने लगता हूँ

तेज रफ्तार से दौड़ती बसें, बसों के पीछे भागते लोग, बच्चे सम्हालती औरतें, सड़कों पर इतनी धूल उड़ती है कि मुझे कुछ दिखाई नहीं देता । मैं सोचने लगता हूँ । पुरखे

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काफ़्का के प्राहा में

एक उपस्थिति से कहीं ज़्यादा उपस्थित हो सकती है कभी-कभी उसकी अनुपस्थिति एक वर्तमान से ज़्यादा जानदार और शानदार हो सकता है उसका अतीत एक शहर की व्यस्त दैनन्दिनी से अधिक पठनीय

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थोड़ा-सा

अगर बच सका तो वही बचेगा हम सबमें थोड़ा-सा आदमी– जो रौब के सामने नहीं गिड़गिड़ाता, अपने बच्चे के नंबर बढ़वाने नहीं जाता मास्टर के घर, जो रास्ते पर पड़े घायल को

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आफ्टर ब्रेकअप

साथ रहने का वादा मर्तबान में पड़ा अचार था सड़ गया फेंक दिया और सुनो तुम्हारी सब्जी में नमक हमेशा ज्यादा होता था और मैं नहीं भूला मेरी व्हाईट शर्ट पर तुम्हारे

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