जलते हुए मकान में कुछ लोग

इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं। वह मकान वेश्यागृह ही था। मन्दिर नहीं था। धर्मशाला भी नहीं। शमशाद ने कहा था – तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। सोने के लिए

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मधुआ

“आज सात दिन हो गए पीने की कौन कहे, छुआ तक नहीं। आज सातवाँ दिन है सरकार!” “तुम झूठे हो। अभी तो तुम्हारे कपड़े से महक आ रही है।” “वह…वह तो कई

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शाम को जिस वक़्त

शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं जानता हूँ रेत पर वो चिलचिलाती धूप है जाने किस उम्मीद में फिर

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अमृतसर आ गया

गाड़ी के डिब्बे में बहुत मुसाफिर नहीं थे। मेरे सामनेवाली सीट पर बैठे सरदार जी देर से मुझे लाम के किस्से सुनाते रहे थे। वह लाम के दिनों में बर्मा की लड़ाई

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मेरे पच्चीस शील

मेरी कविता का आधार आस्था है, इस आस्था के पचीस शील हैं जो नीचे लिखे गए हैं। पहला शील – मैं बहुत अक्लमंद हूँ। मुझ जैसे और भी हैं। बहुत-से ऐसे हैं

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गूंगे

‘शकुतंला क्या नहीं जानती?’ ‘कौन? शकुंतला! कुछ भी नहीं जानती।’ ‘क्यों साहब? क्या नहीं जानती? ऐसा क्या काम है जो वह नहीं कर सकती?’ ‘वह उस गूंगे को नहीं बुला सकती।’ ‘अच्छा

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आपकी हँसी

निर्धन जनता का शोषण है कह कर आप हँसे लोकतंत्र का अंतिम क्षण है कह कर आप हँसे सबके सब हैं भ्रष्टाचारी कह कर आप हँसे चारों ओर बड़ी लाचारी कह कर

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निराला भाई

एक युग बीत जाने पर भी मेरी स्मृति से एक घटा भरी अश्रु- मुखी सावनी पूर्णिमा की रेखाएँ नहीं मिट सकी हैं। उन रेखाओं के उजले रंग न जाने किस व्यथा से

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संवदिया

हरगोबिन को अचरज हुआ – तो, आज भी किसी को संवदिया की जरूरत पड़ सकती है! इस जमाने में, जबकि गांव गांव में डाकघर खुल गए हैं, संवदिया के मार्फत संवाद क्यों

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बबूल

बोया पेड़ बबूल का, आम कहाँ से होय?’ जिसने पहली-पहली बार ऐसा कहा होगा, उसका मन फलों के राजा के रस से आप्लावित रहा होगा। रहना भी चाहिए। वह कौन है, जिसे

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