जलते हुए मकान में कुछ लोग

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इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं। वह मकान वेश्यागृह ही था। मन्दिर नहीं था। धर्मशाला भी नहीं। शमशाद ने कहा था – तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। सोने के लिए धुला हुआ बिस्तरा मिलेगा। सुबह वहीं नहा-धो लोगे, चाय पीकर चले आओगे। मैंने कहा था – ठीक है। सेल्समैन को और क्या चाहिए! कहीं रात काट लेने की जगह। कोई कमरा। कोई भी औरत। और, अन्त में नींद।

औरत बुरी नहीं थी। मगर, एकदम टूटी हुई थी। बोली – फालतू पैसे हों, तो देसी रम की बोतल मँगवाओ। सारा दिन इस औद्योगिक नगर में चक्कर काटने के बाद मैंने पाँच हजार रुपयों का बिजनेस कर लिया था। कमीशन के लगभग तीन सौ रुपये मेरे बनते थे। रम की बोतल मँगवाई जा सकती थी। रम की बड़ी बोतल और सामने के पंजाबी होटल से मुर्गे का शोरबा। औरत खुश हो गई। मेरे गले में बाँहें डालकर मचलने लगी। कहने लगी – तुम दिलदार आदमी हो। ज़रा रात ढल जाने दो, तुम्हें खुश कर दूँगी। मैं ठंडी औरत नहीं हूँ। एक बार गरम होऊँगी, तो तुम्हीं परेशान हो जाओगे…।

औरतें इस मकान में और भी थीं। मगर शमशाद ने कहा था – दूसरी के पास मत जाना। उसका नाम दीपू है, दीपू। पंजाब की है। उसी के पास जाना। और मैं दीपू के पास आ गया था। मैंने कहा था – शमशाद ने तुम्हारे पास भेजा है। मैं न्यूबिल्ट कम्पनी का सेल्समैन हूँ। कल सुबह कलकत्ते चला जाऊँगा। रात-भर रहना चाहता हूँ। मगर, पैसे मेरे पास ज़्यादा नहीं हैं।

कौन शमशाद? कश्मीरी होटलवाला? वह खुद क्यों नहीं आया? ज़रूर परले मकान की कलूटी मेम के पास गया होगा। अब उसी के पास जाता है – दीपू ने एक लम्बी उसाँस लेकर उत्तर दिया था, और मेरे द्वारा मिले हुए बीस रुपये मकान मालिक को देने चली गई थी। फिर लौटकर बोली थी – फालतू पैसे हों, तो देसी रम की बोतल मँगवाओ। कुल आठ रुपये में आ जाएगी। शराब और औरत यहाँ सस्ते में मिलती हैं। देखो न, मैं बैठती तो रात-भर के पचास रुपये लोग खुशी से दे जाते। मैं मेहनती औरत हूँ। कायदे से काम करना जानती हूँ। तुम ज़रा भी शर्म मत करो। समझ लो, अँधेरे में हर औरत हर मर्द की बीवी होती है। अँधेरे में शर्म मिट जाती है। रंग, धर्म, जात-बिरादरी, मुहब्बत, ईमान, अँधेरे में सब कुछ मिट जाता है। सिर्फ कमर के नीचे बैठी हुई औरत याद रहती है।

मगर रात के बारह भी नहीं बजे होंगे कि पुलिस आ गई। मकान का मुख्यद्वार अन्दर से बन्द था। मालिक ने खिड़की से झाँककर देखा होगा, पुलिस ही है। वह दीपू के कमरे के पास आया। बोला – दीपू पुलिस आ गई है। ग्राहक के साथ भागो! वह दीपू जैसी दूसरी औरतों के कमरों के पास गया। ग्राहक के साथ भागना होगा। कहाँ? दीपू बोली – नीचे अण्डरग्राउण्ड में। चलो, वहीं पिएँगे, और तबीयत खुश करेंगे। घबराओ नहीं, पुलिस ज़्यादा देर नहीं रुकेगी। दीपू नंगी थी, और मैं भी लगभग प्राकृतिक अवस्था में ही था। उसने एक चादर लपेट ली, और बोली – चलो गिलास उठा लो! जल्दी करो!

चारों तरफ घना अन्धकार है, और नंगी फर्श पर बैठे हुए हम लोग रोशनी का इन्तजार कर रहे हैं। रोशनी कब आएगी? दीपू अपनी देह से चादर उतार कर फर्श पर बिछाती है। दीवार टटोलकर बोतल और गिलास किनारे रखती है। फिर पूछती है – और कौन-कौन आया है? चन्द्रावती, तुम भी आई हो? अँधेरे में कहीं कुछ नहीं दिखता है। अपना हाथ-पाँव तक नहीं। और इस अँधेरे में दीपू की आवाज चाँदी की सफेद तलवार की तरह चमकने लगती है – बोलते क्यों नहीं? यहाँ की आवाज ऊपर नहीं जाती है। और अब तो मालिक पुलिसवालों को रुपये दे चुका होगा। अब क्यों डरते हो? बोलते क्यों नहीं? और कौन है यहाँ?

कौन? दीपू रानी? तू भी आ गई? कैसा गाहक है तेरे पास? बोतल लेकर आया है? भाई, एक औंस मुझे भी देना। यहाँ बड़ी सर्दी है। देगी तो? कोई दूसरी औरत अँधेरे की परतें तोड़ती है। मुझे लगता है, कमरे में प्रेत-छायाएँ रेंग रही हैं। कमरे में टहलता हुआ कोई आदमी मेरी जाँघ पर पाँव रख देता है। और, डरकर उछल जाता है – मैंने समझा कोई जानवर है।

जी हाँ, जानवर ही है! आप खुद को क्या समझते हैं? आदमी? हुजूर, यहाँ जानवर ही आते हैं। आदमी नहीं! आप हैं कौन? – दीपू हँसने लगती है। तब कमरे में टहलता हुआ वह आदमी सिगरेट के लिए माचिस जलाता है। वह ओवरकोट डाले हुए है। सिर पर हैट नहीं है। पाँवों में जूते नहीं। बड़ी-बड़ी घनी मूँछे हैं। चेहरे से फरिश्तों जैसा भाव टपकता है। मैं पूछता हूँ – आप कौन हैं?

मैं यहाँ की एक फैक्टरी में इंजीनियर हूँ। अकेला आदमी हूँ, वक्त काटने के लिए यहाँ चला आया। क्या पता था, वक्त इस तहखाने में कटेगा – वह दुबारा माचिस जलाता है, और इस कमरे के दूसरे मुसाफिरों को देखने लगता है। छोटा-सा कमरा है। दीवारें नंगी हैं। फर्श सीलन से तर। अपनी ही बाँहों में सिर डाले हुए, एक दुबली-पतली लड़की एक कोने में बैठी है। हरी लुंगी और सफेद कमीज पहने हुए एक बूढ़ा आदमी बीच कमरे में चुपचाप खड़ा है।

चन्द्रावती एक विद्यार्थी जैसे दिखते हुए कमसिन लड़के की गोद में सिर डाले लेटी हुई है। वह लड़का चन्द्रावती का माथा सहला रहा है। माचिस की तीली बुझ जाती है। इंजीनियर कमरे में चक्कर काटता रहता है। उसके जूतों की भारी और सख्त आवाज अँधेरे में गूँजती रहती है। कमरे के बीच में खड़ा बूढ़ा आदमी कहता है – मेरे रुपये भी चले गए। मेरी औरत भी उधर ही रह गई। मेरे पास शराब भी नहीं है। सिगरेट भी नहीं। पता नहीं, पुलिस कब तक ऊपर शोर मचाती रहेगी।

ऊपर वाकई आग लगी हुई है। छत जैसे टूट जाएगी। पुलिस शायद कमरों की तलाशी ले रही है। शायद, ऊपर रुकी हुई औरतों को तमाचे लगा रही है। शायद, मकान-मालिक को हंटर मार रही है। कुछ पता नहीं चलता है। सिर्फ, लगता है, ऊपर कोई दौड़ रहा है, और चीख-पुकार मची हुई है।

विद्यार्थी दिखता हुआ कम उम्र का लड़का बड़ी महीन आवाज में चीखता है – माचिस जलाओ।…मेरी पैंट में कोई कीड़ा घुस गया है। माचिस जलाओ… । मगर, कोई माचिस नहीं जलाता। इंजीनियर चुपचाप टहलता रहता है। दीपू मेरे करीब खिसक आती है, और दीवार पकड़कर बोतल और गिलास ढूँढ़ती है। गिलास टूट जाता है। जरा-सी ठोकर से गिलास टूट जाता है। मैं फर्श टटोलता हुआ, गिलास के बड़े टुकड़े किनारे हटाने लगता हूँ। शीशे के टुकड़ों की आवाज में बड़ा ही कोमल संगीत है। दीपू बोतल खोलकर दो घूँट शराब गले में डालती है, फिर बोतल मुझे थमाकर खाँसने लगती है। पुरानी खाँसी। शायद दमा है। चन्द्रावती कहती है अकेले-अकेले पीने से यही होता है…

दूँगी, बदजात! तुम्हें भी दूँगी। इस तरह गालियाँ मत निकाल – दीपू चीखती है, फिर खाँसने लगती है। सर्दी से जमे हुए अपने पाँव मैं सीधा करने की कोशिश करता हूँ। दाएँ पाँव की उँगलियों में रबर की कोई चीज़ फँस जाती है। पाँव ऊपर खींचकर उसे उठाता हूँ। इस तहखाने में भी रबर की यह चीज लाना लोग नहीं भूल सके। इस अँधेरे में भी नहीं भूल सके। मैं मुस्कुराता हूँ। मुस्कुराने के बाद रम की बोतल गले में उतारने की कोशिश करता हूँ। पता नहीं, अब कितनी शराब बची है। चन्द्रावती अँधेरे में लड़खड़ाती हुई आती है, और हँसती हुई मेरी गोद में गिर पड़ती है। दीपू समझ गई है कि चन्द्रावती ही है। कहती है – देख चन्द्रा, शराब, पियेगी, तो इस बाबू को खुश करना पड़ेगा। यह बाबू हमारी ही जात का है। हम चमड़ा बेचते हैं, यह भी चमड़े से बने खेलकूद के सामान बेचता है…

हाय रे, तुम तो एकदम नंगे हो – चन्द्रावती खिलखिलाने लगती है। मैं खुश होकर बोतल उसके हाथ में थमा देता हूँ। वह खुश होकर दीपू के हाथ में बोतल थमा देती है। बोतल खाली हो चुकी है, और मेरा सिर चकराने लगा है। रबर की वह चीज़ अब तक मेरी उँगलियों में पड़ी है। मेरा सिर घूम रहा है। दुर्गन्ध से मेरी नाक फटी जा रही है। किस चीज की दुर्गन्ध? लगता है, आसपास कई चूहे मरे पड़े हों। चन्द्रावती बहुत जरा-सी औरत बन गई है।

मैं उसकी ब्लाउज़ के अन्दर हाथ डालता हूँ। अन्दर जैसे कुछ नहीं है। सिर्फ माँस का झूलता हुआ एक टुकड़ा। मगर, उसकी जाँघों की पकड़ बेहद मजबूत है। मैं नफ़रत में भरकर दूर खिसकना चाहता हूँ। लेकिन खिसक नहीं पाता। मेरी दोनों टाँगें उसकी जाँघों के बीच कैद हैं। बेहद मोटी जाँघे! भारी कमर। दीपू कहती है – सिर्फ़ मिलिटरीवाले इस इन्द्री के पास आते हैं। हरामजादी लोगों को तोड़कर रख देती है। क्यों मिस्टर सेल्समैन, क्या हाल है?

मैं सिकुड़ जाता हूँ। चन्द्रावती ताकत लगाती है, मैं सिकुड़ जाता हूँ। लगता है, मेरी जाँघों के बीच कोई मरा हुआ चूहा चिपक गया हो। शराब ने मुझे और भी सर्द बना दिया है। तभी बीच कमरे में खड़ा बूढ़ा आदमी चीखने लगता है – साँप! मुझे साँप ने काट खाया है! रोशनी जलाओ…मुझे साँप ने काट लिया, रोशनी करो…रोशनी…

मगर रोशनी नहीं होती है। इंजीनियर के जूतों की आवाज रुक जाती है। मगर माचिस नहीं जलती। चन्द्रावती के साथ आया हुआ लड़का गरजता है- माचिस जलाओ! इंजीनियर साहब माचिस जलाओ। मुझे साँप काट लेगा…मैंने एक बार एक साँप को मार दिया था। साँप मुझसे बदला लेगा…मुझे बचाओ। मुझे बचा लो…

मगर इंजीनियर पर कोई असर नहीं होता। वह कहता है – मेरे पास दो सिगरेट हैं, और माचिस की कुल दो तीली हैं, जब सिगरेट पीने की ख्वाहिश होगी, तभी माचिस जलाऊँगा।

अँधेरे में इंजीनियर की सिगेरट का सिरा चमकता है। उसकी घनी मूँछे चमकती हैं। वह एक किनारे दीवार के सहारे टिका खड़ा है। और वह बूढ़ा चीख रहा है। और वह लड़का चीख रहा है। और चन्द्रावती कहती है – बूढ़े को मरने दो। कब्र में नहीं गया, यहाँ ऐश करने चला आया। और दीपू कहती है – रबर का साँप होगा। आठ नम्बर कमरेवाली सुलताना पिछली पुलिस-रेड में अपने साथ यहाँ रबर का साँप ले आई थी। हम लोग खूब डर गए थे। सुलताना का गाहक तो डर के मारे बेहोश हो गया था।

रबर का साँप नहीं, सच्चा साँप है! मेरे पाँव से खून बह रहा है। जहर ऊपर चढ़ रहा है। जहरीला साँप है। सबको काटेगा। सबको काट लेगा – बूढ़ा आदमी चीखता रहता है, और फर्श पर गिरकर छटपटाने लगता है। दीपू हँसती है – साला, डर से छटपटा रहा है…अरे अब्बाजान, बूढ़े आदमी हो, मर ही गए तो क्या बिगड़ जाएगा…क्यों बे चन्द्री क्या करती है? जल्दी खलास क्यों नहीं करती? बेचारे ने आठ की शराब मँगवाई है, बीस रुपये कैश दिए हैं, मुर्गे का गोश्त तो ऊपर ही पड़ा रह गया…जरा बेचारे को मौज-पानी लेने दे। दो-एक कसरत मैं भी करूँगी। जल्दी कर चन्द्री, मैं अब गर्म होती जा रही हूँ।

अब इंजीनियर माचिस जलाकर दूसरी सिगरेट सुलगाता है। बूढ़े के पाँव में गिलास का टुकड़ा गड़ गया है। वाकई खून बह रहा है। बूढ़ा फर्श पर पाँव पटककर चीख रहा है – मैं कोयले का स्टॉकिस्ट हूँ। मर गया तो लोग गोदाम तोड़कर सारा कोयला उठा ले जाएँगे…बेटा मेरा आवारा निकल गया है। घर-दरवाजे तक बेचकर रंडियों को दे देगा…मुझे बचाओ…बाहर जाने दो। मुझे इस तहखाने से निकालो…।

विद्यार्थी दिखते हुए लड़के ने माचिस की रोशनी में दीवार के सहारे चुपचाप और अकेली लड़की को देख लिया है। वह खिसकर उसके पास जा रहा है। लड़की डरी हुई और खामोश है। लड़का शायद, चन्द्रावती के अभाव को पूरा करना चाहता है। इंजीनियर माचिस बुझा देता है, और सीने की ताकत लगाकर सिगरेट के कश खींचता रहता है। शराब की खाली बोतल दीपू की जाँघों के बीच दबी पड़ी है। लकड़ी के कुन्दों की तरह मोटी-मोटी जाँघें । चन्द्रावती ने मेरी गर्दन में अपनी बाँहें फँसा दी हैं, और मुझे हिलाती हुई कह रही है – ए मिस्टर, थोड़ा होश तुम भी करो…अकेले मैं क्या करूँ? थोड़ी ताकत लगाओ।

मगर मुझे लगता है, कि मैं अब बेहोश हो जाऊँगा। यह घुटन, यह ठंडी फर्श, इंजीनियर की सिगरेट का धुआँ, मरे हुए चूहों की दुर्गन्ध, बूढ़े आदमी की चीख-पुकार, दीपू की जाँघों में अटकी हुई बोतल…मुझे लगता है कि मैं अब बेहोश हो जाऊँगा। अचानक बोतल दूर फेंककर दीपू चीखती है, तू हट जा चन्द्रावती, तू अब रास्ता छोड़। मैं इस बाबू को बताती हूँ…चल, परे हट, साले को कच्चा चबा जाऊँगी…

और रम की खाली बोतल दीवार के सहारे बैठी उस लड़की के पास गिरती है। बड़ी ही पतली आवाज में वह चीखती है – मैं मर गई। मेरा सिर फट गया… मैं मर गई।

वह लड़का शिकारी कुत्ते की तरह उछलकर उसके पास पहुँच जाता है। इंजीनियर फिर कमरे में टहलने लगा है। उसके जूतों की आवाज बड़ी भयावनी है। चन्द्रावती फर्श पर गिरी हुई हाँफ रही है। दीपू मेरे ऊपर चढ़ी है, और मुझे झकझोर रही है। मैं धीरे-धीरे सो जाता हूँ। शायद बेहोश हो जाता हूँ। शायद मर जाता हूँ। मर जाने के सिवा, अब और कोई उपाय नहीं रह गया है।

 

 

राजकमल चौधरी

राजकमल चौधरी (1929 - 1967) हिंदी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि एवं कहानीकार थे। मैथिली में स्वरगंधा, कविता राजकमलक आदि कविता संग्रह, एकटा चंपाकली एकटा विषधर (कहानी संग्रह) तथा आदिकथा, फूल पत्थर एवं आंदोलन उनके चर्चित उपन्यास हैं।

राजकमल चौधरी (1929 - 1967) हिंदी और मैथिली के प्रसिद्ध कवि एवं कहानीकार थे। मैथिली में स्वरगंधा, कविता राजकमलक आदि कविता संग्रह, एकटा चंपाकली एकटा विषधर (कहानी संग्रह) तथा आदिकथा, फूल पत्थर एवं आंदोलन उनके चर्चित उपन्यास हैं।

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