क्वीन विक्टोरिया की प्रशंसा में लिखा गया क़सीदा

वह रानी, कि चन्द्रमा जिसका मुकुट है, आकाश जिसका आसन है, जो जमशेद जैसी प्रतापी है, फरीदून जैसी तेजस्वी और काऊस जैसा स्थान रखने वाली है, उसके पास संजर जैसा दबदबा है

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समय की शिला पर

समय की शिला पर मधुर चित्र कितने किसी ने बनाए, किसी ने मिटाए। किसी ने लिखी आँसुओं से कहानी किसी ने पढ़ा किन्तु दो बूँद पानी इसी में गए बीत दिन ज़िन्दगी

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कोड

भाषा को उलट कर बरतना चाहिए मैं उन्हें नहीं जानता यानी मैं उन्हें बख़ूबी जानता हूं वे बहुत बड़े और महान् लोग हैं यानी वे बहुत ओछे, पिद्दी और निकृष्ट कोटि के

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मैं देव न हो सकूँगा

  सुनो, व्यर्थ गई तुम्हारी आराधना! अर्घ्य से भला पत्थर नम हो सके कभी? बजबजाती नालियों में पवित्र जल सड़ गया आखिर! मैं देव न हुआ! सुनो, प्रेम पानी जैसा है तुम्हारे

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तुम्हारे भीतर

एक स्त्री के कारण तुम्हें मिल गया एक कोना तुम्हारा भी हुआ इंतज़ार एक स्त्री के कारण तुम्हें दिखा आकाश और उसमें उड़ता चिड़ियों का संसार एक स्त्री के कारण तुम बार-बार

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जीवन वृत्तांत

उठाया ही था पहला कौर कि पगहा तुड़ाकर भैंस भागी कहीं और पहुंचा ही था खेत में पानी कि छप्पर में आग लगी, बिटिया चिल्लानी आरंभ ही किया था गीत का बोल

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अवांतर प्रसंग

उस पुरानी मेज के इर्द-गिर्द हम चार-पांच लोग बैठे बतिया रहे थे। बात सतही तौर पर राजनीति से शुरू होती थी और बाजार भावों पर आकर अटक जाती थी। आप जानते ही

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रिश्ता

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मैं कूर्सकी रेलवे स्टेशन पहुँचा जहाँ से ठीक नौ बजे सिम्फिरापोल्स्की एक्सप्रेस ट्रेन को छूटना था। टी.टी. ने मेरा टिकट देखा और मैं डिब्बे में घुस गया। वहाँ पहले से ही एक

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कहाँ से

तुमने पूछा – कविता कहाँ से आती है? काले कोलतार से आती है क़मीज़ के उस हिस्से से जो पतलून के भीतर है एक पैर की चप्पल के अकेलेपन से आती है

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शत्रु

ज्ञान को एक रात सोते समय भगवान ने स्वप्न में दर्शन दिये और कहा, ‘‘ज्ञान, मैंने तुम्हें अपना प्रतिनिधि बनाकर संसार में भेजा है। उठो, संसार का पुनर्निर्माण करो।’’ ज्ञान जाग पड़ा।

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