क्या तुम रोई हो?

तुम देख लेते हो उसे वहाँ से निकल कर आते हुए अपने भीतर जहाँ जाकर सिसकती है अक्सर तुम पूछते हो : क्या हुआ? वह कहती है : कुछ नहीं तुम फिर पूछते

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एक ठहरा हुआ चाकू

अजीब बात थी, ख़ुद कमरे में होते हुए भी बाशी को कमरा ख़ाली लग रहा था। उसे काफी देर हो गई थी कमरे में आए–या शायद उतनी देर नहीं हुई थी जितनी

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भाग्य रेखा

कनाट सरकस के बाग में जहाँ नई दिल्ली की सब सड़कें मिलती हैं, जहाँ शाम को रसिक और दोपहर को बेरोजगार आ बैठते हैं, तीन आदमी, खड़ी धूप से बचने के लिए,

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गुलकी बन्नो

‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन

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क़र्ज़ की पीते थे

एक जगह महफ़िल जमी थी। मिर्ज़ा ग़ालिब वहां से उकता कर उठे। बाहर हुआदार मौजूद था। उस में बैठे और अपने घर का रुख़ किया। हवादार से उतर कर जब दीवान-ख़ाने में

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तुलादान

धोबी के घर कहीं गोरा चिट्टा छोकरा पैदा हो जाए तो उस का नाम बाबू रख देते हैं। साधू राम के घर बाबू ने जन्म लिया और ये सिर्फ़ बाबू की शक्ल-ओ-सूरत

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तस्वीर, इश्क़ की खुटियाँ और जनेऊ

वे तीन वेश्याएँ थीं। वे अपना नाम और शिनाख्त़ छुपाना नहीं चाहती थीं। वैसे भी उनके पास छुपाने को कुछ था नहीं। वे वेश्याएँ लगती भी नहीं थीं। उनके उठने-बैठने और बात

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एक तवाइफ़ का ख़त

मुझे उम्मीद है कि इससे पहले आपको किसी तवाइफ़ का ख़त न मिला होगा। ये भी उम्मीद करती हूँ कि कि आज तक आपने मेरी और इस क़ुमाश की दूसरी औरतों की

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डॉक्टर के शब्द

डॉ. रमन के पास मरीज बीमारी के आखिरी दिनों में ही आते थे। वे अक्सर चिल्लाते, ‘तुम एक दिन पहले क्यों नहीं आ सकते थे?’ इसका कारण भी साफ था – डॉक्टर

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पहेली

रामदयाल पूरा बहुरूपिया था। भेस और आवाज बदलने में उसे कमाल हासिल था। कॉलेज मे पढ़ता था तो वहाँ उसके अभिनय की धूम मची रहती थी; अब सिनेमा की दुनिया में आ

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