मैंने हारने के लिए

मैंने हारने के लिए यह लड़ाई शुरू नहीं की थी इन अभाव के दिनों में भी जितना खुश हुआ उतना पहले कभी नहीं कि इधर कर्ज़ में जीने की आदत मैंने कई

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न जी भर के देखा

न जी भर के देखा न कुछ बात की बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की उजालों की परियाँ नहाने लगीं नदी गुनगुनाई ख़यालात की मैं चुप था तो चलती हवा रुक गई ज़बाँ

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अपनी अपनी दौलत

पुराने ज़मींदार का पसीना छूट गया, यह सुनकर कि इनकम टैक्स विभाग का कोई अफ़सर आया है और उनके हिसाब–किताब के रजिस्टरऔर बही–खाते चेक करना चाहता है. अब क्या होगा मुनीम जी?

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कहावतों का चक्कर

जब मैं हाईस्कूल में पढ़ता था, तब हमारे अंग्रेज़ी के शिक्षक को कहावतें और सुभाषित रटवाने की बड़ी धुन थी. सैकड़ों अंग्रेज़ी कहावतें उन्होंने हमें रटवाई और उनका विश्वास था की यदि हमने

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मत लिखो

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मत लिखो — अगर फूट के ना निकले बिना किसी वजह के मत लिखो। अगर बिना पूछे-बताए ना बरस पड़े, तुम्हारे दिल और दिमाग़ और जुबाँ और पेट से मत लिखो ।

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तुम आयी

तुम आयी जैसे छीमियों में धीरे- धीरे आता है रस जैसे चलते – चलते एड़ी में काँटा जाए धँस तुम दिखीं जैसे कोई बच्चा सुन रहा हो कहानी तुम हँसी जैसे तट

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फिर बसंत आना है

तूफ़ानी लहरें हों अम्बर के पहरे हों पुरवा के दामन पर दाग़ बहुत गहरे हों सागर के माँझी मत मन को तू हारना जीवन के क्रम में जो खोया है, पाना है

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पूर्व प्रेमिकाएँ

मेरे बाद वे उन छातियों से भी लगकर रोई होंगी जो मेरी नहीं थीं दूसरे चुंबन भी जगे होंगे उनके होंठों पर दूसरे हाथों ने भी जगाया होगा उनकी हथेलियों को उनकी

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