लिखती हुई औरतें

इन दिनों झुंड में बैठकर जंतसार गाते हुए तुम्हारे पोथी-पतरा, वेद-पुराण को धता बताकर धर्म की चौखट लाँघ लिख रही हैं औरतें वे लिखती हैं प्रेम वे लिखती हैं विरह वे लिखती

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जो मार खा रोईं नहीं

तिलक मार्ग थाने के सामने जो बिजली का एक बड़ा बक्स है उसके पीछे नाली पर बनी झुग्गी का वाक़या है यह चालीस के क़रीब उम्र का बाप सूखी साँवली लंबी-सी काया

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चोरी

प्रेम इस तरह किया जाए कि प्रेम शब्द का कभी ज़िक्र तक न हो चूमा इस तरह जाए कि होंठ हमेशा ग़फ़लत में रहें तुमने चूमा या मेरे ही निचले होंठ ने

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एक अशुद्ध बेवक़ूफ़

बिना जाने बेवक़ूफ़ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है। मगर यह जानते हुए कि मैं बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा हूँ और जो मुझे कहा जा

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प्यार के बहुत चेहरे हैं

मैं उसे प्यार करता यदि वह ख़ुद वह होती मैं अपना हृदय खोल देता यदि वह अपने भीतर खुल जाती मैं उसे छूता यदि वह देह होती और मेरे हाथ होते मेरे

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फूलों से भरी डाल

दुनिया से मेरे जाने की बात सामने आ रही है ठंडी सादगी से यह सब इसलिए कि शरीर मेरा थोड़ा हिल गया है मैं तैयार तो क़तई नहीं हूँ अभी मेरी उम्र

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आऊँगा

नए अनाज की ख़ुशबू का पुल पार करके मैं तुम्हारे पास आऊँगा ज्यों ही तुम मेरे शब्दों के पास आओगे मैं तुम्हारे पास आऊँगा जैसे बादल पहाड़ की चोटी के पास आता

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मन बहुत सोचता है

मन बहुत सोचता है कि उदास न हो पर उदासी के बिना रहा कैसे जाए? शहर के दूर के तनाव-दबाव कोई सह भी ले, पर यह अपने ही रचे एकांत का दबाव

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मैं झुकता हूँ

दरवाज़े से बाहर जाने से पहले अपने जूतों के तस्मे बाँधने के लिए मैं झुकता हूँ रोटी का कौर तोड़ने और खाने के लिए झुकता हूँ अपनी थाली पर जेब से अचानक

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