नदी बोली समन्दर से, मैं तेरे पास आई हूँ मुझे भी गा मेरे शायर, मैं तेरी ही रुबाई हूँ मुझे ऊँचाइयों का वह अकेलापन नहीं भाया लहर होते हुये भी तो मेरा
साधो ये मुरदों का गाँव पीर मरे पैगम्बर मरिहैं मरि हैं जिन्दा जोगी राजा मरिहैं परजा मरिहैं मरिहैं बैद और रोगी चंदा मरिहैं सूरज मरिहैं मरिहैं धरणि आकासा चौदां भुवन के चौधरी
Moreफ़ारिहा क्या बहुत ज़रूरी है हर किसी शेरसाज़ को पढ़ना क्या मेरी शायरी में कम है गुदाज़ क्या किसी दिलगुदाज़ को पढ़ना यानी मेरे सिवा भी और किसी शायरे दिलनवाज़ को पढ़ना
Moreक्या तुम कविता की तरफ़ जा रहे हो ? नहीं, मैं दीवार की तरफ़ जा रहा हूँ । फिर तुमने अपने घुटने और अपनी हथेलियाँ यहाँ क्यों छोड़ दी हैं ? क्या तुम्हें चाकुओं
More“अरी ओ, ई का कान में ठूंसी रहती हो, कुछ पढ़ लिख लिया करो।” “अरे दादी का कह रही हो” (कान से हेडफोन निकाल कर उर्मिला पूछती है) “हम ई कह रहे
Moreये असंगति ज़िन्दगी के द्वार सौ सौ बार रोयी बांह में है और कोई चाह में है और कोई साँप के आलिंगनों में मौन चन्दन तन पड़े हैं सेज के सपनों भरे
Moreमैं तुम्हें ढूँढने स्वर्ग के द्वार तक रोज़ जाता रहा, रोज़ आता रहा तुम ग़ज़ल बन गयी, गीत में ढल गयी मंच से मैं तुम्हें गुनगुनाता रहा … ज़िन्दगी के सभी रास्ते
Moreमैं जिसे ओढ़ता-बिछाता हूँ वो ग़ज़ल आपको सुनाता हूँ एक जंगल है तेरी आँखों में मैं जहाँ राह भूल जाता हूँ तू किसी रेल-सी गुज़रती है मैं किसी पुल-सा थरथराता हूँ हर
Moreजिसे भी प्यार करता हूँ महसूस करता हूँ कि मुझसे बड़ा हो गया है वह और पाता हूँ कि मैं दुनिया का सबसे छोटा आदमी हूँ।
Moreट्यूशन में बैठे -बैठे आशिमा की कमर में दर्द होने लगता है, वो जब अपने कमर को सीधा करती है और एक सांस भरती है तो उसका वक्ष थोड़ा फूल जाता है।
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