अंधा युग — एक समीक्षा

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स्वाधीनता-संघर्ष के बाद, दुनिया में एक ओर भारत की प्रतिष्ठा बढ़ती गयी, तो दूसरी ओर, घर में सामाजिक ह्रास के चिह्न दिखाई देने लगे। इस सामाजिक ह्रास के कई लक्षणों में से एक है चरित्र के क्षेत्र में व्यक्तिगत धरातल पर नैतिक भावना और व्यवहार की बढ़ती हुई कमज़ोरी। इन कमजोरियों के सामाजिक परिवेश में व्यक्ति के संवेदनात्मक आघात-प्रत्याघात अपना एक इतिहास बनाने लगे। कुछ लोगों को यह नई सामाजिक परिस्थिति अत्यंत सुविधाजनक प्रतीत हुई। एक विशेष प्रकार के चरित्र के लोग, आवश्यक मनोवैज्ञानिक उपादान जिनके पास थे ही, साथ ही, प्रस्तुत सामाजिक परिवेश, सामग्री और साधन (भी थे।) चरित्र की अन्य शैली के लोग इस ह्रासग्रस्त परिवेश से अपना सामंजस्य स्थापित न कर सके। वे उन्नति की ओर नहीं प्रगति की ओर बढ़े।

प्रगति की ओर उनकी उन्मुखता ने कई रूप लिए। सामाजिक परिवेश में परिवर्तन सभी का अभीष्ट था। किंतु प्रगति क्या? उसके आदर्श क्या हैं? आदि-आदि बातों पर अलग-अलग रास्ते अपनाए गए। इन अलग-अलग रास्तों के आपसी झगड़े महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे इस लेख के क्षेत्र के बाहर हैं।

एक बात सर्व-सामान्य है। वह यह कि सामाजिक ह्रास आज के युग की एक महत्वपूर्ण वास्तविकता है। इस वास्तविकता की कुछ विशेषताओं को एक फैण्टेसी के ज़रिए श्री धर्मवीर भारती ने पाठकों के सामने प्रस्तुत किया है।

इस फ़ैण्टेसी का भावनात्मक केंद्र है मौजूदा सभ्यता (यह शब्द भारी-भरकम है, इसलिए यथार्थ कहिए) की समीक्षा जो महाभारत काल के कुछ चरित्रों के अंकन के द्वारा प्रस्तुत की गई है। इस प्रकार के प्रयत्न के दो पहलू ध्यान में रखने लायक हैं। एक, चरित्रों के आघात-प्रत्याघात द्वारा जो मानव-दृश्य उपस्थित किया गया है, वह दृश्य और उसकी प्रभावकारिता। दूसरे यह कि इस दृश्य द्वारा सभ्यता की जो आलोचना की गई है उसके सही या गलत होने की स्थिति। इन पहलुओं का आपसी संबंध द्रष्टव्य है।

कुल मिलाकर जो दृश्य उपस्थित किया गया है उसका मूल भावना केंद्र सभ्यता की आलोचना है। उत्तररामचरित के समान, या शेक्सपीयर की किसी ट्रैजेडी की भाँति, यदि उस दृश्य के मूल में आलोचनात्मक भावना न रहकर कोई और भावना रहती, तो उस दृश्य की प्रभावकारिता तथा उस समस्त दृश्य के अंग-रूप पात्रों के सौंदर्य के विशेष विश्लेषण से ही काम चल जाता। अंधा युग उस ढंग से चरित्र प्रधान नहीं है, जैसे कि अन्य नाटक हुआ करते हैं। उसमें चरित्र का कोई विकास नहीं है, वे बने-बनाए हैं। उनका महत्व और मूल्य यही है कि वे लेखक के भाव, विचार और भाषा बोलते हैं, तथा तिगड्डों पर खड़े होकर उन तिगड्डों की स्थितियों की दृष्टि से एक यथार्थ के प्रति प्रतिक्रिया करते हैं। लेखक द्वारा यथार्थ के आकलन के चरित्र के वे विभिन्न प्रतीक हैं; उसकी दृष्टि और वाणी प्रकट करने के साधन हैं। इस दृष्टि से, यह दृश्य-काव्य आत्मपरक है, ‘सब्जेक्टिव’ है।

और उसकी यह सब्जेक्टीविटी आज की पीढ़ी का एक मूड बताती है और साथ ही एक धारणा भी स्पष्ट करती है। इसलिए वह महत्वपूर्ण हो उठी है। वह मूड वास्तविक है, वह धारणा वास्तविक है।

मूड यह है कि मौजूदा सभ्यता या समाज या यथार्थ – जैसा कि वह है – से किसी मानव-प्रगति की आशा नहीं की जा सकती। सामाजिक संबंधों के यथार्थ से प्रेरित इस निराशा की भावना की तह में यह धारणा प्रतिष्ठित है कि मौजूदा सभ्यता के मसीहा जिस वर्ग या श्रेणी या तबके से निकले हैं, उनके नेतृत्व में चलने वाली सभ्यता या समाज, कुछ भी कह लीजिए, का नाश अवश्यम्भावी है।

इस मनोवैज्ञानिक केंद्र से विकसित यह फ़ैण्टेसी समाज की जिन विशेषताओं को प्रकट करती है, वे विशेषताएँ महत्वपूर्ण होने के कारण फ़ैण्टेसी और भी महत्वपूर्ण हो उठी है। उसका भावनात्मक आघात अचूक हो गया है। उसका रसात्मक प्रभाव केवल भाव या रस तक ही सीमित न रहकर विचारोत्तेजक बन गया है। दूसरे शब्दों में, भावना की राइफ़ल से विचारों के कारतूस कौंधकर निकल पड़े हैं। इस फ़ैण्टेसी की यह सफलता द्रष्टव्य, विचारणीय और मूल्यवान है।

चूँकि यह मौजूदा समाज की एक ढंग से आलोचना है, इसलिए इस प्रश्न को ठुकराया नहीं जा सकता कि उसकी सीमाएँ और क्षमताएँ क्या हैं, यानी प्रस्तुत आलोचना की पर्यालोचना आवश्यक और महत्वपूर्ण है।

पहली बात जो बार-बार दिमाग़ से टकराती है, वह यह है कि श्री भारती ह्रास के लक्षणों को उसके कारणों से कन्फ़्यूज़ कर देते हैं। नैतिक गिरावट स्वयं एक लक्षण है, जो अन्य घटना-क्रमों या अन्य मानसिक विकार-दृश्यों का कारण हो सकती है। किंतु इस गिरावट का कारण व्यक्तिगत और मनोवैज्ञानिक है या ऐतिहासिक-समाजशास्त्रीय? इस प्रश्न पर या तो श्री भारती ने विचार नहीं किया, या विचार करके उसे छोड़ दिया, उसकी तह में नहीं गए। स्पष्ट रूप से कहा जाए तो श्री भारती सभ्यता की आलोचना तो करते हैं, किंतु समाजशास्त्रीय जिज्ञासा के अभाव के शिकार होकर। सभ्यता का ह्रास संवेदनात्मक रूप से अनुभव करते हैं; उसे प्रकट करने के लिए उन्हें आलोचना की शरण लेनी ही पड़ती है। किंतु उनकी आलोचना केवल व्यक्तित्व और व्यक्ति-मानव की शुभेच्छात्मक संवेदनाओं के नैतिक दृष्टिकोण को त्याग नहीं पाती। यह प्रकट करता है कि श्री भारती का वैचारिक अंतरंग छायावादी है। सभ्यता या समाज अनेक श्रेणियों में सूत्रबद्ध मानव का समुदाय है, जिसके भीतर एक ढाँचा है। उस ढाँचे का एक इतिहास है। इस इतिहास में एक विकास सूत्र है। इस विकास सूत्र के कुछ नियम हैं। इन नियमों के प्रति सच्ची समाजशास्त्रीय जिज्ञासा आवश्यक है। श्री भारती के पूरे मनोलोक में समाजशास्त्रीय जिज्ञासा का नितांत अभाव है। इस अभाव पर हमें खेद है। खेद इसलिए कि सभ्यता और समाज की प्रचण्ड उपस्थिति श्री भारती के मन में होते हुए भी, वे उस सभ्यता और समाज के स्वरूप के प्रति वैज्ञानिक दृष्टि से सोचने के लिए तत्पर नहीं हैं, जबकि आज विज्ञान किसी भी फ़िलॉसॅफ़ी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो उठा है।

हम यह पहले ही कह चुके हैं कि प्रस्तुत फ़ैण्टेसी यथार्थ की कुछ प्रमुख विशेषताओं को रूपक से प्रकट करती है। यदि श्री भारती में यह समाजशास्त्रीय जिज्ञासा होती, तो इस फैण्टेसी का रूपायन किसी और ढंग से होता, और उसका मूल्य और भी बढ़ जाता।

फिर भी, श्री भारती ने अपनी फ़ैण्टेसी के अंतर्गत व्यक्तियों द्वारा उभारे गए (उन्हीं के शब्दों में) जिन निष्क्रिय सत्यों, तटस्थ सत्यों और अर्ध-सत्यों को उद्घाटित करने का प्रयत्न किया है, वे सत्याणु, वस्तुतः, कुछ प्रवृत्तियाँ सूचित करते हैं – ऐसी प्रवृत्तियाँ जो संस्कृति और समाज के नेतृ-वर्ग की हैं।

इस वर्ग के शासन-प्रशासन अनुशासन में चलने वाली सभ्यता ह्रास-ग्रस्त है। उसका नाश भी अवश्यम्भावी है। किंतु, सामाजिक रूपांतरों के घटना-क्रम विकसित करने वाली शक्तियाँ कौन-सी हैं, इसका क्रम-उल्लेख प्रस्तुत काव्य में नहीं है। इसका कारण यह है कि लेखक के मनोलोक में ऐसी किन्हीं शक्तियों की स्थिति की जानकारी या ज्ञान-संवेदना का अभाव है। इस अभाव के फलस्वरूप, मानव-सुलभ आशात्मक भविष्यवाद का एकमात्र आधार वे क्षण हैं जहाँ मनुष्य मनुष्य हो जाता है। यह संवेदनात्मक व्यक्ति-मानव अपनी संवेदनाओं के सामान्यीकरण के द्वारा ही मुक्ति और दायित्व (उन्हीं के शब्दों में) के प्रयास करेगा।

श्री भारती को यह जानना चाहिए था कि भिन्न-भिन्न वर्गों में मुक्ति या दायित्व की कल्पनाएँ भिन्न-भिन्न होती हैं। दायित्व की जो कल्पना एक श्रमिक की है, वह धनिक की नहीं। जो मज़दूर की है वह पूँजीपति की नहीं। मौजूदा जनतंत्रात्मक प्रणाली द्वंद्व-प्रणाली है। कामायनी में इड़ा अपने आत्मनिवेदन में, रहस्यात्मक शब्दावली में ही क्यों न सही, इसे स्पष्ट रूप से प्रकट करती है। इस द्वंद्व में ‘दायित्व’ और ‘मुक्ति’ और ‘मर्यादा’, यहाँ तक कि ‘मानवता’ की कल्पना भी भिन्न-भिन्न है। इसलिए, जिस ‘दायित्व’ और ‘मुक्ति’ की कल्पना को सभ्यता के अवलम्ब के रूप में श्री भारती प्रकट करते हैं, वह व्यक्ति-मानव की एक शुभेच्छा में एकरूप, किंतु विभिन्न वर्गावस्थाओं में भिन्न स्वरूप है। श्री भारती का आशात्मक भविष्यवाद एक बहलावा है। वह बहलावा इसलिए है कि उसमें सामाजिक रूपांतर के किसी ठोस वैज्ञानिक आधार का अभाव है।

डॉ. देवराज को अंधा युग पढ़कर, कामायनी की याद आई। यह स्वाभाविक है, किंतु अंधा युग का लेखक दार्शनिक नहीं है। कामायनी में विचारों और अनुभवों के सामान्यीकरण का दर्शन है। उसकी आलोचना एक दार्शनिक की समीक्षा-बुद्धि प्रकट करती है।

श्री भारती की आलोचना एक उत्पीड़न-विवेक का विस्फोट है। प्रकृति, दिशा और जीवन-अनुभवों की दृष्टियों से ये दो कवि भिन्न-भिन्न क्षेत्रों और स्तरों के हैं।

अंधा युग नयी साहित्यिक पीढ़ी का एक अत्यंत मूल्यवान और महत्वपूर्ण प्रयास है – ऐसा प्रयास जिस पे व्यापक बहस होना आवश्यक है। हम इस कृति के लिए श्री भारती का अभिनंदन करते हैं।

 

गजानन माधव 'मुक्तिबोध'

गजानन माधव 'मुक्तिबोध' (1917 - 1964) की प्रसिद्धि प्रगतिशील कवि के रूप में है. हिन्दी साहित्य में सर्वाधिक चर्चा के केन्द्र में रहने वाले मुक्तिबोध कहानीकार भी थे और समीक्षक भी. उन्हें प्रगतिशील कविता और नयी कविता के बीच का एक सेतु भी माना जाता है.

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