कलम का सिपाही

आँखों के आगे से रहे-सहे पर्दे भी गिरते जा रहे हैं। समष्टि का आदर्श जो अब तक केवल एक भावना थी, अब उसे बुद्धि का पक्का आधार मिल रहा है। ‘राष्ट्रीयता और

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कविता में वाक्य विन्यास

कहते हैं कविता कम शब्दों में बहुत कुछ कहती है. शायद इसलिए इसके सभी तत्त्व महत्वपूर्ण माने गए हैं. हर शब्द, हर छवि महत्वपूर्ण है. वाक्य विन्यास की भूमिका भी इस लिहाज़

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कविताएँ : आसित आदित्य

1. तुम्हें सौगंध है, मेरे क़ातिल प्रेम करने के लिए नादान होना उतना ही है आवश्यक जितना कि जीवित रहने के लिए उम्मीद का होना। तुम्हारे खंजर से टपकते मेरे लहू की

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ठेले पर हिमालय

ठेले पर हिमालय’ – खासा दिलचस्‍प शीर्षक है न। और यकीन कीजिए, इसे बिलकुल ढूँढ़ना नहीं पड़ा। बैठे-बिठाए मिल गया। अभी कल की बात है, एक पान की दूकान पर मैं अपने

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सुलगती टहनी

प्रयाग : 1976 मुँह अँधेरे सीटी सुनाई देती है-घनी नींद में सुराख बनाती हुई-एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो ढेस-सा

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दिनकर की काव्य चेतना

दिनकर राष्ट्रीय भाव धारा के प्रमुख कवि हैं। इस प्रसंग में ध्यान देने की बात यह कि राष्ट्रीय भाव धारा में कई अंतर्धाराएँ हैं, जैसे राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम की कई धाराएँ हैं।

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रीतिकाल – मिथक और यथार्थ

मध्यकाल जिसे कहते हैं उसको दो संदर्भों में देखना चाहिए। साहित्य के इतिहास का काल विभाजन प्रायः समाज के इतिहास के काल विभाजन के आधार पर ही होता है। इसमें कभी-कभी विडंबनापूर्ण

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आलोचना की संस्कृति और संस्कृति की आलोचना

यदि ”प्रच्‍छन्‍नता का उद्घाटन,” जैसा कि आचार्य शुक्‍ल आचार्य शुक्‍ल ने कहा है: ”कवि-कर्म का प्रमुख अंग है” तो आलोचना-कर्म का वह अभिन्‍न अंग है। यह प्रच्‍छन्‍नता सभ्‍यता के आवरण निर्मित करते

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