ननद-भौजाई

पदुमा बहुत दुखी और अत्यन्त चिन्तित-सी आँगन में आई। आँखों में अपराध और पश्चात्ताप की सलज्ज रेखा थी। अपनी भौजी से बिना कुछ बोले ही, पूरब की कोठरी में घुस गई। रसोईघर

More

घर की याद

आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है, अब सवेरा हो गया है, कब सवेरा हो गया है, ठीक से

More

बच्चन — आदमी और कवि

देह के बच्चन, मन के बच्चन, समाज के बच्चन, सभ्यता और संस्कृति के बच्चन, सरकार के बच्चन, जनता के बच्चन और काव्य के बच्चन, ये सब बच्चन मुझे एक जैसे ही लगे

More

बग़ैर इजाज़त

नईम टहलता टहलता एक बाग़ के अन्दर चला गया… उसको वहां की फ़ज़ा बहुत पसंद आई। घास के एक तख़्ते पर लेट कर उसने ख़ुद कलामी शुरू कर दी। “कैसी पुरफ़िज़ा जगह

More

चाँदनी की पाँच परतें

चाँदनी की पाँच परतें हर परत अज्ञात है। एक जल में एक थल में एक नीलाकाश में एक आँखों में तुम्हारे झिलमिलाती एक मेरे बन रहे विश्वास में क्या कहूँ, कैसे कहूँ

More

नयी कविता एवं मेरी रचना प्रक्रिया

यह विषय मेरे लिए नया है। कोई सोच नहीं सकता कि वह किस तर्ज से लिखता है। आधुनिक काव्य की जो रचना-प्रक्रिया है उस पर निर्णय लेना पाठकों का कार्य है। आधुनिक

More

जलते हुए मकान में कुछ लोग

इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं। वह मकान वेश्यागृह ही था। मन्दिर नहीं था। धर्मशाला भी नहीं। शमशाद ने कहा था – तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी। सोने के लिए

More

मधुआ

“आज सात दिन हो गए पीने की कौन कहे, छुआ तक नहीं। आज सातवाँ दिन है सरकार!” “तुम झूठे हो। अभी तो तुम्हारे कपड़े से महक आ रही है।” “वह…वह तो कई

More

तन्हाई

फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहीं राह-रौ होगा कहीं और चला जाएगा ढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबार लड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़ सो गई रास्ता तक तक

More
1 60 61 62 63 64 68