कई दिनों बाद पति-पत्नी जब घर लौटे तो बग़ीचे के फूल किसी ने तोड़ लिए थे पति बेहद नाराज़ हुआ घर में घुसते ही सामान इधर-उधर फेंकने लगा चीख़-चीख़ कर गालियाँ देने
Moreमंज़िल पे न पहुँचे उसे रस्ता नहीं कहते दो चार क़दम चलने को चलना नहीं कहते इक हम हैं कि ग़ैरों को भी कह देते हैं अपना इक तुम हो कि अपनों
Moreइन दिनों झुंड में बैठकर जंतसार गाते हुए तुम्हारे पोथी-पतरा, वेद-पुराण को धता बताकर धर्म की चौखट लाँघ लिख रही हैं औरतें वे लिखती हैं प्रेम वे लिखती हैं विरह वे लिखती
Moreउस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं मुतमइन ऐसा है वो जैसे हुआ कुछ भी नहीं अब तो हाथों से लकीरें भी मिटी जाती हैं उस को खो कर तो मिरे पास
Moreतिलक मार्ग थाने के सामने जो बिजली का एक बड़ा बक्स है उसके पीछे नाली पर बनी झुग्गी का वाक़या है यह चालीस के क़रीब उम्र का बाप सूखी साँवली लंबी-सी काया
Moreबिना जाने बेवक़ूफ़ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है। मगर यह जानते हुए कि मैं बेवक़ूफ़ बनाया जा रहा हूँ और जो मुझे कहा जा
Moreमैं उसे प्यार करता यदि वह ख़ुद वह होती मैं अपना हृदय खोल देता यदि वह अपने भीतर खुल जाती मैं उसे छूता यदि वह देह होती और मेरे हाथ होते मेरे
Moreदुनिया से मेरे जाने की बात सामने आ रही है ठंडी सादगी से यह सब इसलिए कि शरीर मेरा थोड़ा हिल गया है मैं तैयार तो क़तई नहीं हूँ अभी मेरी उम्र
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