इक्कीसवीं शताब्दी में कविता

इस विषय पर सोचते हुए मैं थोड़ा-सा ‘इक्कीसवीं शताब्दी’ की तरफ गई, थोड़ा-सा उस ‘कविता’ की तरफ जो अभी लिखी जानी है, लेकिन ज्यादा समय मैं ‘में’ में ही अटकी रही। एक

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अमांडा लवलेस की कविताएँ

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1. मुझसे यह कहना कि हर मर्द के इरादे बुरे नहीं होते कुछ नहीं करता मुझे आश्वस्त करने के लिए तुमसे कुछ दूर चले जाने के बाद भी कुछ नहीं बदला होगा

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असहमति और स्वतंत्रता

बाइस अगस्त, 1934 की बात है. तब मैं एक साल का भी नहीं हुआ था. मेरे चाचा ज्योतिर्मय सेनगुप्ता ने बर्दवान जेल से मेरे पिता को एक चिट्ठी भेजी थी. उन्होंने मेरा

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कर्मनाशा की हार

काले सांप का काटा आदमी बच सकता है, हलाहल ज़हर पीने वाले की मौत रुक सकती है, किंतु जिस पौधे को एक बार कर्मनाशा का पानी छू ले, वह फिर हरा नहीं

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भूतपूर्व प्रेमिकाओं को पत्र

देवियों, माताओं और बहनों, अब मात्र यही सम्बोधन शेष बचे हैं जिनसे इस देश में एक पुराना प्रेमी अपनी अतीत की प्रेमिकाओं को पुकार सकता है. वे सब कोमल मीठे शब्द, जिनका

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मुक़ाबला ईश्वर से था

क्या यह कयामत का दिन है? ज़िंदगी के कई वे पल, जो वक्त की कोख से जन्मे और वक्त की कब्र में गिर गये, आज मेरे सामने खड़े हैं… ये सब कब्रें

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आकाशदीप

1 “बंदी!” “क्या है? सोने दो।” “मुक्त होना चाहते हो?” “अभी नहीं, निद्रा खुलने पर, चुप रहो।” “फिर अवसर न मिलेगा।” “बड़ा शीत है, कहीं से एक कंबल डालकर कोई शीत से

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क़दम रखता है जब रस्तों पे यार आहिस्ता आहिस्ता

क़दम रखता है जब रस्तों पे यार आहिस्ता आहिस्ता तो छट जाता है सब गर्द-ओ-ग़ुबार आहिस्ता आहिस्ता भरी आँखों से हो के दिल में जाना सहल थोड़ी है चढ़े दरियाओं को करते

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भगत सिंह का पत्र बटुकेश्वर दत्त के नाम

(फाँसी की सज़ा सुनने के बाद मुलतान जेल में बंदी अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के नाम नवम्बर, १९३० का भगतसिंह का पत्र) सेंट्रल जेल, लाहौर नवम्बर, 1930 प्यारे भाई, मुझे दंड सुना

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